मंगलवार, 4 नवंबर 2014

गुस्सा - तू मेरा पीर

गुस्सा, तू मेरा पीर
मैं तेरा मुरीद II

जब भी आना, करना न तू कोई मोल-तोल
या कोई समझौता, न तू झुकना, न मरना
न कुटिल या मलिन ही होना,
कि कभी तेरे आने का पश्चाताप हो II

जहाँ भी हो अन्याय, उठ खड़े होना
बेबाक और बेख़ौफ़ अलबत्ता
और दे जाना कोई सीख, की
उस खीझ की वजह को मात दी जा सके II

गुस्सा, तेरा पाक-साफ़ आना
सच के साथ होने की निशानी है
शर्त सिर्फ ये की उस गुस्से पर
सब्र न करना कभी, होगा तुझपर फक्र तभी II

गुस्सा, तू मेरा पीर
मैं तेरा मुरीद II


शनिवार, 21 जून 2014

सरकारी नौकर का सरकारी नौकर

क्यों एक सरकारी नौकर, किसी
सरकारी नौकर का बस नौकर बन जाता है
जो उसका काम नहीं उसे  खामोश रह कर जाता है
जिंदगी की कौन सी मुश्किलात उसे ऐसा बनने को मजबूर कर देती हैं

झुकने से  पहले वह उठना तो जरूर चाहा होगा
अपने वजूद को तो ऐसे ही ना ठुकराया होगा
पहली बार जब सब्जी लाने या  बच्चे को स्कूल छोड़ने गया होगा
एक बार मरा तो वो जरूर होगा

पर शायद उसे अपने बच्चे की शक्ल दिख जाती होगी
या बूढ़े बाप और घर की याद आ जाती होगी, तभी
एक सरकारी नौकर किसी सरकारी नौकर का बस नौकर बन जाता है
जीते हुए भी आदमी एक लाश बन जाता है



शुक्रवार, 13 जून 2014

नेकी का सबब

हों कोई भी हम, कहीं भी हम 
करें कुछ भी, मगर यह सोचकर 
एक नेकी का सबब 
कई अंजानों को नेक बनाती है I

सोमवार, 19 मई 2014

शाह चला शिकार पर

किया ऐलान ललकार कर
बादशाह निकला शिकार पर
शाही गज पर सवार हो
चला बड़ी ताव  से वो
शाह चला शिकार पर

शाही जंगल में पड़ा पड़ाव
ढोल बजे, नगाड़े बजे,
प्रजा डरी उत्साहित सी
शाह का पूरा साथ दिया
शाह चला शिकार पर

रोज नगाड़ा बजता रहा
शाह कई जाल बुनता गया
सैनिक यहाँ-वहाँ फैलाये गए
चारा यहाँ-वहाँ बिखराया गया
शाह चला शिकार पर

शाह कूच करता रहा
घेरा घना होता गया
शिकार, हाय! फँसता गया
शाह की भौहें खिलती गयीं
शिकार की आस बढ़ती गयी
शाह चला शिकार पर

चारों ओर से घिरा हुआ
बब्बर ना, अब वो डरा हुआ
शाह के जाल में फँस ही गया
उफ्फ! शिकार वो बन ही गया
शाह चला शिकार पर

शाह का डंका खूब बजा
शिकार शाह औ मुसाहिबों का हुआ
प्रजा को हासिल कुछ हुआ
प्रजा ने मिलकर तय ये किया
अब अगली बार साथ नहीं देंगे, पर
फिर, शाह चला शिकार पर


बुधवार, 7 मई 2014

अच्छे दिन, अच्छों के

गंगा के तीरे उसका गाँव देखा
पेड़ पौधे, चिड़ियाँ, तितलियाँ तमाम देखा
पानी का फैला विस्तार देखा, रेतीले तट पर
बहार देखा, आज उसका घर खुले आम देखा

फूंस का घर, न दरवाज़े न ताला
ना ही भीतर दिखा कोइ सामान निराला
मिट्टी की दिखी चूल्ह, कुछ बर्तन दिखे आला
और दिखी कोनों मे मकड़ियों कि लटकती जाला

एक अरगन पर कुछ पड़े कपडे दिखे
कुछ कांच की सीसियाँ कुछ रात की ढिबरियाँ दिखीं
चूल्हे के पास पड़े जलावन की कुछ चिपरियाँ दिखीं
कुछ पुरानी सी हो चली बरेडों क़ी सिसकियाँ दिखी

कोने में लूली सी पडी इक खाट दिखी
उसपर कुछ गुदड़ी और नीचे पडी चाट दिखी
एक ही बाकस एक टूटी अटैची दिखी
बच्चोँ की दो चार फटी पूरानी क़िताबें दिखी

घुसते ही घर हो गया थ खत्म
इसी मे रहता है छः परिवारोँ का कुटुंब
ये है इनकी स्थिति, ये किसका है जुल्म
अब इस बार भी प्यारे मत कह देना इनको
आलसी, पियक्कड़ और कामचोर, तुम

जब चाँद पर भारत क तिरंगा दिखा, तब भी
इस घर मे ना बल्ब दिखा ना शौच दिखा
ना ही अय्याशी का कोइ ख़िलौना दिखा
ना ही आज़ाद भारत का कोई तराना दिखा

सत्तर साला होने को आये, न गरीबी हटी
न इनका भारत चमका, न किसी को ये खटका
अब कहते हो कि अच्छे दिन आने वाले हैं
खैर, आने वाले हैं अच्छे दिन, अच्छों केII


मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

वोट दो तुम

सियासत के सियासी तरीकों को देखो
बेईमानी   मक्कारी के छियासी तरकीबों को देखो
 देखो लोकतँत्र के सरपरस्तों को देखो
इंसानी महफ़िल मे फैली शैतानी फितरत को देखो

बिकते खरीदते इरादों को देखो
उसूलों को सूली पर चढ़ाते दल-बदलुओं को देखो
बहुत खूब देखोचुनावी तमाशे को देखो
खुली आँखों से   खुले दिल से देखो

करो फैसला  बता दो इन्हे तुमनही लाश तुम
 दागियों-दगाबाजों के नहीं साथ हो तुम
ना ही हिन्दु -मुसलमां के नाम पे फिसलते हो तुम
ना ही किसी के इशारे पर चलते हो तुम

जो सच लगे उसी का साथ दो तुम
लोकतंत्र को मजबूती का अंजाम दो तुम
कर लो इरादा  बदलना वतन को है
अपने हक का इस बार वोट दो तुम


बुधवार, 27 नवंबर 2013

गरीबों के नाम पर इज्जत, पैसा, शांति...

बड़े लोगों का जत्था फिर निकला फरेब करने
नवाबों का, अफसरशाहों का, जमींदारों का, मालिकों का
चोरों का, मक्कारों का, चापलूसों का, गद्दारों का, बेईमानों का
देखो, ये फिर लामबंद हुए काली कमाई से शान्ति कमाने को

फिर इन्हे आवाज आई मर चुके दिल के कोनों से
ये फिर ठण्ड में अपना नाम करने चले
ये फिर लोगों में कम्बल बांटने चले
ये फिर दिखावे और ढोंग की चाल चलने चले

ये बड़ी आसानी से भुला देते हैं कि, ये हैं
तभी तो कम्बल चाहते लोगों पर छत नहीं
ये वो बहरूपिये होते हैं जो चंद टुकड़े फ़ेंक
उससे भी खूब कमाना जानते हैं इज्जत, पैसा, शांति

सुना है सीएसआर की नयी दूकान इन लोगों ने बनायी है
जो पहले खूब लूटती है, फिर कुछ रेवड़ियां बाँट देती है
लूट के माल को हजम कर, गरीबों के हकों को मारकर
मन कि शान्ति कमाना आसान तो नहीं...

और है हिम्मत और ईमानदारी तो ये पूंछे खुदसे
कहाँ से आता है वो पैसा, जो इनको इजाज़त देता है
कम्बल बांटने की, सीएसआर कि दूकान चलाने की
इज्जत, पैसा, शांति गरीबों के नाम पर कमाने की...