शनिवार, 27 मार्च 2010

भारत तेरी जय हो

भारत तेरी जय हो, नहीं कहूँगा...
जात पाँत में जकड़ा हुआ,
भेद भाव से त्रस्त यह देश
धर्म का जहर है घुला हुआ
कुंठित सा दिखता यह देश
भारत तेरी जय हो, नहीं कहूँगा...

जहां राजनीती की रोटी सेंकने के लिए
प्रांतवाद, जातवाद, भाषा और धर्म का
सहारा लिया जाता हो,
जहां लोकतंत्र मर चुकी हो और
प्रेस पूरी तरह बिक चुकी हो
तुम ही कहो कैसे कहूँ भारत तेरी जय हो...

जहां रक्षक ही भक्षक बन बैठे हों,
मानवता को खुलेआम कुचलते हों
जन सामान्य के लिए बनने वाली योजनाये
मुट्ठी भर के कमाने की कुंजी बन जाती हों
भारत तेरी जय हो...यह कहते नहीं बनता

जहां गोदामों में अनाज बर्बाद हो रहा हो
पर देश में ही लोग भूखे मर रहे हों
जहा कुछ मुट्ठी भर गरीबों को कुचलते हुए,
दुनिया के अमीरों से आगे निकलते जा रहे हों
जहां फ़ोन, कंप्यूटर, टीवी, गाड़ी सस्ती होती जा रही हो
रोटी, पढाई, दवाई किसानी महँगी होती जा रही हो
तुम ही सोचो ... क्या कह सकते हो भारत तेरी जय हो

जहाँ सेज, माल्स जैसे शैतान बनाए जा रहे हों
पूंजीवाद सर चढ़कर बोल रहा हो
अम्बानी, टाटा सरकार से बड़े हो गए हों
क्या तुम कहोगे... भारत तेरी जय हो

जहां आज भी लोग सर पर
मैला ढोने को मजबूर हों
जहां आज भी बंधुआ मजदूरी
सरेआम होती हो
जहाँ बच्चों का बचपना
गयाब कर दिया जाता हो
माफ़ करना दोस्त
नहीं कहूँगा भारत तेरी जय हो...

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