शनिवार, 3 अप्रैल 2010

आज़ादी...??

हम आज़ाद देश में रहते हैं

आज़ादी का बिगुल बजाते हैं

एक कंपनी से आज़ादी पायी

आज कइयों सर पर बैठे हैं...


घर के चिराग अपने नेता

घर में ही आग लगाते हैं

लोगों का पैसा गायब कर वो

अपनी जेबें भरते हैं

पशुओं का चारा खाया था

बच्चों का चारा भी खा ये रहे

मेहनत मजदूरी करने वालों को

पल-पल की मौत ये मार रहे...


अमीर का पेट बढ़ता ही रहा

गरीब का पेट हो रहा गायब

किस आज़ाद देश मे होता है

की बच्चा भूख से मरता है...


जहाँ सूखे मुरझाये खेत देखकर

किसान का प्राण पखेरू उड़ जाता है

ये आज़ादी कैसी है

जहाँ भीषण शोषण फैला है ...


इस आज़ादी के साठ साल में

हमने क्या-क्या पाया है

शिक्षा को बाजारू कर दी

डॉक्टरों से धंधा कराया है...


भूख से मरते लोग वही जो

हमको भोजन देते हैं

प्यास से मरते लोग वहीँ के

जहां से नदियाँ बहती हैं...


पानी को बोतल में बंद कर

ये नया ज़माना लाये हैं

अरे, ऐसी आज़ादी का क्या करना

आँसू जहाँ हर आखोँ में...


खैरलांजी जहाँ रोज हो रहा

नारी लज्जित पड़ी हर कोने में

इस आज़ादी का क्या मतलब

गरीब जहाँ प्रताड़ित है...


गाँधी जी के इसी देश में

हिन्दू मुस्लिम दंगे हों

फूट डालो और राज करो की

नीति जहाँ अपनाई जाती हो...


रक्षक हमारे भक्षक बन गए

नेता-गुंडे गुंडे-नेता बन गए

लोगों के ईमान बिक गए

भाई तो भाई से भीड़ गए

नफ़रत की ऐसी आंधी चली

अब प्यार पर पहरे लगते हैं

घोर अँधेरा पसरा है

आज़ादी के इन साठ सालों में...


अरे, इनसे बेहतर गोरे थे

कहने को अपने पराये थे

पर इन शैतानों को क्या कहें

जो अपनों का शोषण करते हैं...


आज़ादी में हम जी तो रहे

पर कैद हमारी दुनिया है

क्या इसे आज़ादी कहते हैं

जहाँ अभी हज़ारों रूढ़ियाँ हैं...


घोर निराशा छाई है

जीने का एहसास मिट रहा

आँखों का है तेज मिट रहा

मन की उमंगें ख़त्म हो रही

अब तो हवाएँ भी दूषित हैं

भटकन दिशाओं में फैली है

घनघोर अँधेरा छाया है

ये आज़ादी अभिशाप बन गयी...


अरे, आज़ादी आज़ादी है

कुछ बनियों की जागीर नहीं

असली आज़ादी लायेंगे हम

आज नहीं तो कल सही...


अपने स्वदेश के वास्ते

बिस्मिल भगत के वास्ते

आज़ाद की धरा पर

आज़ादी हैं हम चाहते...


वो भोर सुहानी लायेंगे

है तरुणों की ललकार यही

हम क्रांति का बिगुल बजायेंगे

पाने अपने अधिकार सभी...

"आवारा राही"




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