गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

अफसाना

सुना था प्यार में बहुत शक्ति होती है

पत्थर में भी फूल खिला सकती है

पर किस पत्थर से दिल लगा लिया

जालिम ने मुझे आवारा पत्थर बना दिया...

मुझे तुझसे कोई शिकवा नहीं

न ही कोई शिकायत है

पर ये भी सच है की

तेरी मुस्कुराहटों को तरसुंगा मैं

तेरी आवाज को ढूढूंगा मैं

तेरी शरारतों को न भूल पाऊंगा

मीलों मील फैली तेरी खुशबू में

मदहोश लहराऊँगा मैं...

तुझे अपने आँगन में लाने का

ख्वाब नहीं बेंच पाउँगा

तुझे अपनी बाहों में समेट लेने की

चाहत को न मिटा पाउँगा

कब तक छुपती रहोगी अपने आप से

कब तक छुपाती रहोगी अपने आप को

कब तक भागती रहोगी डरकर इस संसार से...

मैंने तेरे साथ जीवन के सारे ताने बाने बुने

तेरा साथ मिलने से बहुत कुछ होना था

जीवन को विस्तार मिलना था

इक नया संसार शुरू होना था

मेरी साँसों को सुर मिलना था

सपनों को सच होना था

पर तेरी खामोशी ने....

तुझसे दूर मेरा कोई वजूद नहीं

तेरे सिवा मेरी कोई दुनिया नहीं

तेरे बिना मेरा कोई सपना नहीं

तेरे बगैर मेरा कोई जीना नहीं...

माना मेरा समय अब हीन है

हालत भी अपनी दीन है

पर हारी नहीं हैं आँखें मेरी

हारा नहीं है मेरा मन

बस तेरे इंतज़ार में

तेरे मिलन की आस में

गुजर रहे है मेरे दिन ...

तू आयेगी! ये मुझे है यकीन

तेरे इंतज़ार में ....

आँखों का नूर सजाये बैठा हूँ

कई अरमां लगाए बैठा हूँ

दिल के चराग जलाए बैठा हूँ

कहीं चराग़ बुझ ना जाए इसलिए

आँखों को छलकाए बैठा हूँ ...

अब और नहीं सहा जाता

जीने से भी डर लगता है

फिर भी बड़े उत्साह से

हमने ये जुर्रत की है

कि तुझसे मिलने की चाहत की है

कुछ बीज सपनों के मैंने भी बोये हैं

उन्हें फसल बनने का तू इक मौका दे दे

इस मुर्दा जिस्म को तू जिंदगी बक्श दे....

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