गुरुवार, 20 मई 2010

मुखौटा

मैं थक गया हूँ,अपने आप से
टूट चूका हूँ अपने ही स्वार्थ से
जो सपने देखे थे,जो अरमाँ सजाये थे
सब एक एक कर टूट रहे....

सोचा था ये करेंगे,सोचा था वो करेंगे
पर मेरी लालच ने,हर कदम पर मुझे रोका
मैंने झूठ बोला,आज भी बोल रहा हूँ
अपने आप से,इस समाज से
कई मासूमों से,कई आँखों से
तरह तरह का चोला पहनकर
घूमता रहा बेबाक,असली चेहरा छुपा
सबको धोका देता रहा...

मैं कहता रहा अपने आप से
आज नहीं तो कल सही,कुछ करुँगा जरूर,
अपने गाँव के लिए,इस समाज के लिए,
पर मुझसे कुछ न हो पाया....

न पैसे जोगना मेरा उद्देश्य था
न वैभव,विलास की ही मुझे चाह थी
पर जिंदगी की बनियागीरी ने,
मूल्य की चाहत ने मुझे
मूल्यहीन कर दिया है अब,
जीवन की राग में ऐसे खोया
कि,दूसरों की सेवा क्या करता
खुद की सेवा में खूब रमा मैं

मुखौटा लगाकर किये गए
मेरे कई नाटक, कईयों को
दिखाए हुए हसीं सपने
अब दर्द कर कराह रही हैं
परत दर परत,मुझ पर
लगा मुखौटा उतर रहा है

झूठ का चोला कई रंग का,
कई ढंग से,कई दिनों से पहना मैंने
अब ये चोला उतर रहा
इसका रंग फीका पड़ रहा...

वादे करना बहुत आसान है
उन्हें निभाना उतना ही मुश्किल
अब मैं कुछ न कर पाउँगा,
न ही मुझसे कुछ हो पायेगा
मेरे अँधेरे तन मन में
खंडहर वीरान से इस जीवन में,
कई दिनों से सीने में अब
असहज दर्द बना रहता है

यह पीर अब असहनीय है
आज पंख-हीन हूँ मैं पंक्षी
अब तो स्वछंद रूप से
मेरा उड़ना मुश्किल है...

अचरज से क्या देख रहे तुम,
यह तेरी मेरी कहानी है
ये मुखौटा ओढ़े हुए मैं हूँ,तुम हो
ये हम में से कोई भी हो सकता है..

रविवार, 9 मई 2010

टिप...

कल रिक्शेवाले से मेरा झगडा हो गया
वो मुझसे एक रुपैया ज्यादा माँग गया
मैंने अपना आपा खो दिया, उसे
एक साँस में कई गालियाँ दे गया
तब लोगों ने बताया की
किराया कल से बढ़ गया
मैं झल्लाया हुआ, पैसे फ़ेंक
वहाँ से आगे बढ़ गया

रात को बीवी के साथ होटल गया
खूब मजे से पीया खाया
दो लोगों में मैंने
एक हजार का बिल चुकाया
वेटर को बिना कहे
सौ रुपये का टिप पकड़ाया
हर्षोल्लासित घर वापस आया

शनिवार, 1 मई 2010

लूट का खेल

चली आ रही प्रथा सदा से
लूट का है यह खेल यदा से
लूटा गया, लुटवाया गया
लूटने वालों ने कल भी लूटा
आज भी हैं ये लूट रहे

लूट के लुटेरे मिलकर लूटते
खुले आम बड़े विश्वास से लूटते
निर्भीक बेनिडर हो लूटते
लूट की ऐसी लूट मची रे
लूटन में मजा बड़ा रे भैया
लूटन में रम गए लुटेया
तन से, मन से,धन से लूटा
आदमियत और इंसानियत को लूटा

कल की तो तुम बात ही छोड़ो
आज के इन हालात को देखो
लूट को ऐसी छूट मिली की
लूटने में भी लूट लगी है
कई लुटेरे अब दिखते हैं
मंदिर से संसद तक बैठे
अम्बानी, मोदी, स्वामी तो
मुट्ठीभर कुछ चेहरे हैं
ऐसे लुटेरे मिल जायेंगे
गली गली हर कूचे में

लूट का बाज़ार खूब चला है
मिलकर लूटो, खुलकर लूटो
दिन में लूटो, रात में लूटो,
शहर में लूटो, गाँव में लूटो
ख़ास को छोड़ो, आम को लूटो
राम रहीम के नाम पर लूटो
विकास कार्य के नाम पर लूटो
भूख प्यास के नाम पर लूटो
बाढ़ तूफ़ान में जमकर लूटो
जीने के अधिकार को लूटो

आज लूट आधारभूत बन गयी
पसीने से सनी कमाई लुट गयी
आज लूट इस हद तक पहुँची
अब जीने की चाहत है लुट रही