शनिवार, 1 मई 2010

लूट का खेल

चली आ रही प्रथा सदा से
लूट का है यह खेल यदा से
लूटा गया, लुटवाया गया
लूटने वालों ने कल भी लूटा
आज भी हैं ये लूट रहे

लूट के लुटेरे मिलकर लूटते
खुले आम बड़े विश्वास से लूटते
निर्भीक बेनिडर हो लूटते
लूट की ऐसी लूट मची रे
लूटन में मजा बड़ा रे भैया
लूटन में रम गए लुटेया
तन से, मन से,धन से लूटा
आदमियत और इंसानियत को लूटा

कल की तो तुम बात ही छोड़ो
आज के इन हालात को देखो
लूट को ऐसी छूट मिली की
लूटने में भी लूट लगी है
कई लुटेरे अब दिखते हैं
मंदिर से संसद तक बैठे
अम्बानी, मोदी, स्वामी तो
मुट्ठीभर कुछ चेहरे हैं
ऐसे लुटेरे मिल जायेंगे
गली गली हर कूचे में

लूट का बाज़ार खूब चला है
मिलकर लूटो, खुलकर लूटो
दिन में लूटो, रात में लूटो,
शहर में लूटो, गाँव में लूटो
ख़ास को छोड़ो, आम को लूटो
राम रहीम के नाम पर लूटो
विकास कार्य के नाम पर लूटो
भूख प्यास के नाम पर लूटो
बाढ़ तूफ़ान में जमकर लूटो
जीने के अधिकार को लूटो

आज लूट आधारभूत बन गयी
पसीने से सनी कमाई लुट गयी
आज लूट इस हद तक पहुँची
अब जीने की चाहत है लुट रही

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