रविवार, 12 सितंबर 2010

मेहनत

हल चलाकर खेतों में जो
मेहनत की फसल उगाता है
पत्थर चट्टानों में भी जो
नवनिर्माण के सुर भर जाता है
जलती भट्ठी,घुटती खदानों में,
जीवन की बाज़ी लगाता है
दिन रात परिश्रम करके वो
हम सबकी भूख मिटाता है
क्या भाग्य कहेंगे उसका भी,
वो खुद भूखा रह जाता है

बंधुआ बनकर जीवन उसका
रुखा सूखा कट जाता है
दिन रात मजूरी करके भी वह
इक घरौंदा बना नहीं पाता है
ए भाग्य विधाता तुने भी ये
दुनिया क्या खूब बनाई है
कुछ के आँखों में तारे हैं,
कुछ आँखों में खूब रुलाई है

यह देख बड़ा दुःख होता है,
मानव ने मानवता भुलाई है
सत्य अहिंसा मेहनत की बातें
लोगों ने दिल से हटाई है
अब बेईमानी,मक्कारी और
ऐयाशी की हरियाली छाई है
मेहनत करने वालों की तो
सूरत अब और मुरझाई है

पहले न कभी इतने अम्बानी
और टाटा आबाद हुए
और न ही कभी इस भूमि पर
इतने गरीब बर्बाद हुए
इन लोगों ने ही मिलकर
मेहनत की कमाई दबाई है
लाखों को रौंद कर मुट्ठी भर ने
अपनी दुनिया बसाई है
यह कहना गलत नहीं होगा,
बन गया वो आज कसाई है

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