रविवार, 26 सितंबर 2010

सेक्स की कडुवाहट

सेक्स का मजा वो नहीं लेतीं
जो मजबूरन अपने आप को
किसी दरिन्दे के आगे परोसती हैं
जिनका एक ही दिन में
कई बार चीर हरण होता है
जो चन्द पैसों के लिए किसी के
हवस का शिकार बनती हैं

सड़क किनारे,ट्रक के नीचे
खुले आसमां में सोने वाले
झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले
गर्मी में,पसीने से तरबतर
ठंढी में,हड्डी तोड़ देने वाली
कपकपाहट झेलने वाले
क्या जाने सेक्स का मजा

दस बाई दस के कमरे में
रहते जहां कई लोग,
वहाँ भला कैसे कोई
ले सकता है सेक्स का भोग
कचड़े की कब्रिस्तान और बड़े
नालों पर बसे ये लोग
इनके घरों में सबके लिए
अलग अलग कमरे नहीं होते
घरों में पंखे बिजली नहीं होते
ऐयाशी के लिए दारु शराब,
संगीत की व्यवस्था नहीं होती,न
ही होते हैं ऐशो आराम के साधन

ये वो खुशकिस्मत नहीं
जो चारदीवारी में सुकून
की जिंदगी जी रहे हों और
हम समझते हैं की ये सिर्फ
बच्चे पैदा करना जानते हैं
पैदा करके छोड़ देते हैं
समाज पर बोझ बनने के लिए
हमें हैरां-परेशा करने के लिए

और उस माँ के बारे में
हम कभी नहीं सोचते,जो
हमारे ही गैरजिम्मेदाराना
सिस्टम के चलते,अपने
दो बच्चे पहले ही खो चुकी है

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