सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

गाँव की सैर

बाबूजी,आओ ले चलूँ तुम्हे अपने गाँव अपने घर
शहर से,विकास से,आराम से कोसों दूर
घर है छोटा पर हमारे दिल बड़े हैं
द्वारे आम और नीम के पेड़ खड़े हैं
बाबूजी,हमारे घर एकदम खुले
न मजबूत दरवाजे न ज्यादा सामान
चोरी का कोई डर नहीं,क्यूंकि
चोरी लायक आप लोगों ने
हमारे घरों में कुछ छोड़ा ही नहीं

दो चार बर्तन,मिट्टी के कुछ घड़े
दो चार कपडे,गोबर की महक
सुखी हुई रोटियाँ,आलू प्याज की तरकारी
घारी में ही घर और घर में ही घारी
यही है हमारी छोटी सी संसारी

इसपर,मौसम भी हम पर होती
खूब मेहरबान,सावन का टपकता छप्पर
माघ माह की फटी हुई चद्दर
जेठ में झड चुकी कमीज और धोतर
मानो हमारा मजाक उड़ा रहे हों

बाबूजी, कटिया अभी ख़त्म ही हुई है
पर घर की सारी फसल बिक चुकी
कमाई के सब हाथ थक चुकीं
अब तो भूख भी हमारी नहीं रही
उसपर भी खूब कमाई हो रही

बाबूजी हमारे त्यौहार भी अब
हमसे दूर हो गए हैं ,बड़ों के त्योहारों में
हमारे त्यौहार कहीं खो गए हैं
अब, इक दिया जलाकर,बताशे और गुड
की मिठास से हम मनाते हैं दिवाली,
चुटकी भर गुलाल से पूरी होती हमारी होली

खैर छोड़िये ……….
बाबूजी, ये है भिखिया,मेरा छोटा भाई
इसके बच्चे हैं चार,पर सबकी हालत बेकार
कोई बीमार पड़ जाए,नहीं हो पाता उपचार
अस्पताल है आठ कोस पर,वो भी एकदम बेकार

बाबूजी,आप सोच रहे होंगे हम साफ़ सुथरे क्यूँ नहीं ,
पर दो जोड़ी कपड़ों में,मिट्टी की गोद में
दिनभर रोटी की जद्दोजहद और भागमभाग में
खुद को साफ़ रख पाना,कोई मजाक सा लगता है
यह हकीकत है कोई फ़िल्मी दुनिया नहीं,यहाँ
हमारी धोती दूध सी सफ़ेद नहीं,मटमैली ही होती है

बाबूजी हम भी अपने बच्चों को
खूब पढ़ाना,बड़ा बाबू बनाना चाहते हैं
पर,बिना कॉपी किताब,रात ढिबरी की
रौशनी में,दिन में जानवरों के साथ
निरुत्साही मास्टर और गैरजिम्मेदार स्कूल में
खाली पेट पढना,बड़ा बाबू बनना,आसान नहीं

बाबूजी हमे भी खुले में जाना
कुछ अच्छा नहीं लगता,
पर क्या आप अपने घर में
इक हज़ार में शौच बनवा सकते हैं,
बाँस की टाटी से आँड बना काम चला सकते हैं

बाबूजी,हमारे दोस्तों से मिलो
ये है मंगरू,चिलबिल,कोइल,घसीटा
सब के सब मेरे जिगरी मीता
मेहनत मजदूरी करके सब जीते
पर जब मालिक नाम पुकारते
नाम में उनके चार चाँद लग जाते
मंगरुआ,चिल्बिलवा,कोइला बन जाते
मेरा लहू खौल सा जाता,इक प्रश्न मन में उठता है
क्या आपके नाम के साथ कभी ऐसा होता है ?

बाबूजी बारह साल का मेरा लड़का मुझसे पूंछता है,
हम गरीब कैसे बने,गाँव में हम पिछड़ कैसे गए
मैं निपट गँवार क्या जानू?बाबूजी आप ही बता दीजिये …..

1 टिप्पणी:

  1. गाँवों के नाम पर जो खुशफहमी पलती रही है हमलोगों के दिलों में ...जो हमने वास्तव में देखे भी हैं ....उनपर अच्छा व्यंग्य है ...क्यूंकि शायद अब गाँव भी गाँव जैसे रहे नहीं है ..रोजगार के अवसर भी नहीं है ...
    अच्छी कविता ...!

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