रविवार, 27 नवंबर 2011

शिक्षा की बढती खाई

एक समय की बात है
हुई दो बच्चों की मुलाकात है
दोनों में बहुत चली बात है
मौजूद कुछ बातें तथ्यों के साथ है

कान्हा बोला कन्हैया से
मैं पढता बड़े से स्कूल में, जहाँ
मुश्किल से मिलती एड्मीशन
टीचर्स हमारे बड़े ही ज्ञानी
विषयों पर उनकी पकड़ निराली

खूब लगन से मैं हूँ पढता
क्लास्सेस जाता कोचिंग जाता
इंग्लिश में मैं बातें करता
नब्बे के ऊपर मार्क्स मैं लाता

कन्हैया बोला कान्हा से
मैं पढता सरकारी स्कूल में
हमारे शिक्षक भी बड़े हैं ज्ञानी
मैं भी खूब लगन से पढता
बात भले मैं बड़ा न करता
धरातल का ज्ञान हूँ रखता

कान्हा बोला, धरातल के ज्ञान से
क्या तुम मर्सडीस खरीद पाओगे
या कभी टाटा अम्बानी ही बन पाओगे
हम से आगे कभी निकल न पाओगे
हम से उलझकर बच्चू पछताओगे
पढना न पढना है बेकार तुम्हारा
फोर्थ क्लास की नौकरी ही तो पाओगे, या
कहीं किसी कसबे में रिक्शा ही तो चलाओगे

ऐ.सी. कमरे में हम पढ़ते
इन्टरनेट पर बातें करते
हैकिंग त्विटिंग आती हमको
वीडिओ गेमिंग भाती हमको
कंप्यूटर के ज्ञाता हैं हम
ज्ञान में तुमसे भ्राता हैं हम
आज हमारी मुट्ठी में है
कल के भाग्य विधाता हैं हम

कन्हैया ठनका….
कल के भाग्य विधाता तुम कैसे ?
ज्ञान में हमारे भ्राता तुम कैसे?
फिर वह थोड़ी सोच में पड़ा
याद आई उसे अपने स्कूल की दुर्दशा
वो टूटी फूटी फर्श, दीवारों पर लगे जाले
शौचालय पर लगे ताले, टूटी हुई ब्लैक बोर्ड
और टूटी हुई खिड़कियाँ दरवाजे
टूटे हुए मास्टरजी मेज पर पैर फैलाये हुए
और टूटे हुए बच्चे अपने में ही खोये हुए

उसे याद आया स्कूल के सामने ही
बना सुन्दर सा एक मंदिर, मंदिर में
सोने का मुकुट पहने बैठे कन्हैया
और अपने स्कूल की दुर्दशा
जहाँ गायों को चरवाते चरवैया
उसे याद आया स्कूल का वो सुखा हुआ नल
पानी पीने के लिए घर भागते बच्चों का दल

यह सब सोच वह थोडा गंभीर हुआ
फिर हिम्मत कर कान्हा से बोला
तुम किसी भ्रम में हो जी रहे
या वीडिओ गेम की तरह ही,
हो बनावटी दुनिया में खो गए
जीवन के इस खेल में हम से न कभी
जीत पाओगे, एक ठेंस लगने पर ही
बड़ी सोच में पड़ जाओगे
जीवन का संगीत है हमने जाना
प्रकृति को हमने है पहचाना
फोर्थ क्लास ही नहीं हम
फर्स्ट क्लास भी बनते हैं

माना सुनहरा आज तुम्हारा है,पर
तुमने अधिकार तो छीना हमारा है
मत भूलो अपने हौसले के बल पर ही
कछुआ खरगोश से जीतता है
हमे हमारा सुनहरा कल अब
और समीप दिखाई देता है

ये सब सुन कान्हा मुस्काया
अपने तरकश से इक तीर चलाया
हमको हर विषय के शिक्षक मिलते
खेल कूद के अवसर मिलते, क्विज़,
ओलंपियाड, कांग्रेस के हिस्सा बनते
विदेशों में हम टूर पर जाते
मॉडल्स बनाते प्रदर्शनी लगाते

टीचर्स कभी न पनिशमेंट देते
अपने बच्चों सा है समझते
पढना लिखना तुम क्या जानो
जाओ जाकर प्रकृति को पहचानो
खेती करो और भैंस चराओ
अपना जीवन गाँव में बिताओ


कन्हैया थोडा उदास हुआ
कुछ डर का उसे आभास हुआ
पड़ा बड़े ही सोच में वह…
स्कूल में हमारे मास्टर एक
हाथ में उनके रहती हरदम एक बैंत
अपने बच्चे सा क्या समझेंगे
बात बात में मुर्गा बनाते
पान तम्बाखू हैं वो चबाते
कभी कभार इमला लिखवाते

फिर भी उसने हार न मानी
था तो वह भी अभिमानी
उसने बोला कान्हा से
जीवन से हमने ज्ञान लिया है
मेहनत से हमने काम लिया है
मैं तुमसे बतियाऊंगा, जब
एक बड़ा डॉक्टर बन जाऊँगा

कान्हा बोला डॉक्टर बनना
है कोई बच्चों का खेल नहीं
डॉक्टर और तेरा, है कोई मेल नहीं
डॉक्टर मैं बनकर दिखलाऊंगा
तेरे गाँव के पास वाले शहर में
एक आलिशान अस्पताल बनवाऊंगा
और चालीस साल में बुड्ढा हो जब
तू मेरे पास ही आएगा, अपना इलाज
करवाएगा, तब मैं तुमसे बतियाऊंगा

कन्हैया शुन्य में विलीन, उसे याद आई
सर पर बोझा ढोते अपने बाप की
रिक्शा खीचने वाले अपने साथ के यार की
चूल्हे के धुवें में धुंधली सी दिखती अपने माँ की
दुबले पतले अपने गाय की, बेजान से अपने गाँव की

थोडा मायूस हो कन्हैया बोला कान्हा से
नई कोई बात नहीं कही है तुमने
नई कोई चाल नहीं चली है तुमने
सदियों से है चली आ रही रीत
एकलव्यों को पीछे रखना और
अर्जुनों से करना अच्छी प्रीत
अब और नहीं बर्दाश्त करेंगे हम
अपनी आवाज़ को और बुलंद करेंगे हम

बातें दोनों की ख़त्म हुई
मेरी आँखें भी द्रव्य हुईं
मैं सोच में पड़ा ….
भारत का भविष्य आज
पल रहा ऐसे ही बेजान स्कूलों में
शिक्षा की खाई इस कदर बढ़ गयी है
मित्रता की बात दूर, नहीं है यकीन
कभी किसी कान्हा और किसी कन्हैया में
इस कदर बात भी हो सकती है

कन्हैया जैसे बच्चों के दम तोड़ चुके सपने
आसुंओं के साथ ख़त्म हो चुकी उनकी इच्छाएं
वो कहना चाहते हैं की उन्हें आज
सरकार के साइकिल, कुछ पैसे वजीफे के
दोपहर के भोजन से मुफ्त की किताबों से
कहीं कहीं ज्यादा जरूरत है
अच्छे स्कूल की, अच्छे मास्टर की
अच्छे पढने के माहौल की

सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

रहस्यों की दुनिया

बाबा, संत, फ़कीर और ओझा
इनके जैसा न कोई दूजा
भूत भविष्य बताने वाले,
मृत्यु का रहस्य जानने वाले
कई काम है इनको आते
घर में हैं ये तरक्की लाते
दुःख, बाधा, खतरा, बैचैनी
हैं इन सबको दूर भगाते

अजब गजब है दुनिया इनकी
कर्मकांडों की दुनिया इनकी
जादू टोना करने वाले
जन्मपत्री बनाने वाले
दीक्षा, शिक्षा देने वाले
हाथों की रेखा देखने वाले
पाखंडों की दुनिया इनकी
दुनिया इनकी बहुत बड़ी है

रहस्यों भरी है इनकी दुनिया
बन बैठे अब ये भी बनिया
बाबा के अब भक्त कई है
नियम बाबा के सख्त बड़े हैं
चेलों की फ़ौज बनाकर ये
खूब चलाते अपना धंधा
नहीं हुआ कोई ऐसा बंदा
इन बाबाओं से ले जो पंगा

ऐसा हौवा बनाकर रखते
पढ़े लिखे हैं ज्यादा फंसते
मुँह से इनके फूल हैं झड़ते
आत्मशुद्धि की बात ये करते
कहते अपने अंदर झाँकों
लोभ माया से दूर तुम भागो
स्वयं के अंदर कभी न झाँकते
स्वयं की सेवा में मग्न हैं दिखते

इनका चक्रव्यूह इतना महान
बाहर निकलना नहीं आसान
भँवर में फँसा एक बार जो
बाबामय हुआ चार पुस्त वो
अपना रहस्य न खोलने वाले
अपने मन को न टटोलने वाले
ये बाबा संत फ़कीर भी
अब बदले बदले से लगते हैं

पाखंडों को रोकने वाले
अंधविश्वासों को तोड़ने वाले
जात पाँत से लड़ने वाले
भाईचारा बतलाने वाले
सादा जीवन जीने वाले
आदर्शों पर चलने वाले
ऐसे बाबा संत फ़कीर कहीं
गायब से हो गए लगते हैं

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

बालवान गीत

मिट्टी खोद के पेड़ों को हमने ही लगाया है
अपनी मेहनत से हमने ये बालवान बनाया है
आम इमली पीपल को इस बगिया में सजाया है
हरे-भरे हैं ये पेड़, की इनके जैसा कोई नहीं

पेड़ों की सिंचाई की, जानवर से बचाया है
मिलजुलकर इस स्कूल को हरा भरा बनाया है
पेड़ों को अब हमने अपना प्यारा दोस्त बनाया है
आओ तुम्हे हम ले चलें, हमारे पेड़ों के बीच

खेल खेल में हमने कुछ ऐसा कर दिखाया है
खुद को भी सँवारा है पर्यावरण बचाया है
बालवान हमारा है, बहुत हमे ये प्यारा है
देखो है हमने बदली, हमारे कल की तस्वीर
हरे-भरे हैं ये पेड़, की इनके जैसा कोई नहीं

(लखनऊ के स्कूलों में बच्चों द्वारा, बच्चों के लिए लगाये जा रहे लघुवन पर आधारित)

सोमवार, 22 अगस्त 2011

कहा पेड़ ने…

कहा पेड़ ने इक दिन इंसान से
क्या जानोगे तुम, है मेरी क्या कीमत
शिव ने पिया था हलाहल एक बार
उनकी पूजा करते रहे हो तुम चिरकाल
मैं जो हलाहल पी रहा हूँ पल-पल
उसकी तुम कीमत,क्या आँकोगे

बना कोई ऐसा नहीं शस्त्र अबतक
प्रकाश संशलेषण से उर्जा बनाने का
करे जो करतब, मैं ही हूँ एकमात्र जीव ऐसा
जो करिश्मा ये निरंतर किये जा रहा हूँ
जो तुझको जीवनदान दिए जा रहा हूँ
लगाओगे तुम बोल मेरी क्या बोलो

चिड़ियाँ बनाती हैं घोंसला मुझपर
कई जीव जन्तुओं का आशियाना है मुझपर
नहीं कोई लालच नहीं कोई गम है
औरों के संग मैं जिए जा रहा हूँ
सबको ख़ुशी मैं दिए जा रहा हूँ
बताओ ऐ बुद्धिमानों मेरी कीमत क्या होगी

मैं देता हूँ छाया, फल भी त्यागता हूँ
तेरे जहर को सोखता जा रहा हूँ
मरकर भी, जलकर तेरे भूखे चूल्हों को
मैं अपनी आग दिए जा रहा हूँ
नहीं बदले में तुजसे कुछ मांगता हूँ
अंदाजा भी नहीं तुझे, मेरी कीमत क्या होगी

कई वार तुने हैं मुझपर किये
नहीं कोई हिंसा मैं जानता हूँ,
तू क्या जाने मेरी पीड़ा क्या होवे
बगावत भी करना नहीं जानता हूँ,
ऐ गद्दार प्राणी, बहुत सब्र हममे है
हमारी क्या कीमत नहीं जानता तू

जो अपना न हो सका वो हमारा क्या होगा
तुझसे कोई उम्मीद तो बईमानी होगी
कम से कम इतना तो एहसान कर दे
हमारी पीड़ा को थोडा तू सुन ले
कुल्हाड़ी और आरी अब बनानी तू बंदकर
हमे भी तो जीने का अधिकार दे दे

बुधवार, 17 अगस्त 2011

इंसानों का समाज

आओ मिलकर बनाए ऐसा समाज
जिसकी जरूरत भी है आज
न हो कोई गरीब लाचार
न ही कोई रहे अमीर, बेकार

निर्भय निडर बने समाज
अडिग रहे न्याय की बात
सब जीयें इज्जत के साथ
सबको मिले अपना अधिकार

न माने इंसान जात- पाँत को
काम मिले हर इक हाथ को
इंसानियत हो लोगों का ईमान-अभिमान
ऐसे नेक राह पर इक दिन चले इंसान

कोई न सोये भूँखे पेट
सबकी आँखों में हो तेज
किसी का भी घर ना हो रोड
न रहे लोगों के दिलों में कोई रोग

बुर्के की कालिमा हट जाए,
घूँघट का कलंक छंट जाए
लड़के की चाहत, दहेज़ की बातें
कल की बातें बनकर रह जाएँ

धर्म जात की बात जहां न हो
न ही भ्रष्टाचार का साथ वहाँ हो
आओ मिलकर डालें यह नीव
नए भविष्य को दें आकार
मिलकर बनायें इंसानों का समाज








गुरुवार, 4 अगस्त 2011

मीठे सपने

आज मैंने खूब साईकिल चलाई
मैं रुका सा, साईकिल की पहियों संग
भागने लगा, मीठे सपनो में खोने लगा
दिन में चंदा संग बातें करने लगा

उसका साथ सफ़र सुहाना बनाता गया
की हमने ढेर सारी बातें,
ताज़ी हो आई धुंधली, भूली-बिसरी
मिश्री सी लगने वाली प्यारी प्यारी यादें

कभी चलती वो मेरा हाथ थामे
कभी उडती हवाओं संग
करती बातें तितलियों से, उसकी
मुस्कुराहट को तरसता मेरा मन

जीवन की कठिनाइयों को
आज हमने पीछे छोड़ दिया
बारिश की बूंदों संग, चाय का
वो स्वाद, मस्त हो चले थे हम

शाम होते-होते थके हम दोनों
मैं पैडल मारते मारते
वो बातें करती करती, पर
रुकना हम दोनों ने न चाहा

रात को सिरहाने आकर उसने
हौले से पूंछा, थक गए क्या
मैं हलके से मुस्काया, उससे कहना चाहा
बस साथ हो तेरा, तो तुझे
साईकिल पर दुनिया की सैर कराऊँ
जीवन के मीठे सपनों में मैं खो जाऊं

रविवार, 15 मई 2011

मैं एक मशीन

वक़्त की पहिया तेज हुई है
रेत सरीखा फिसल रही है
इस फिसलन में जीवन भैया
हिरन सरीखा भाग रही है

देखो दौर है कैसा आया, हमने
वक़्त को है पछाड़ना चाहा
मुट्ठीभर ने पैसों का पेड़ लगाया
दर्जन भर, कईयों को कुचलकर
पैसे तोड़ने में रमे हुए हैं, हम भी
दिलो-दिमाग से इसमें लगे हुए हैं

कहीं औरों से पछड न जाऊं
दौड़ से बाहर न हो जाऊं, इसलिए
अर्जुन सरीखा एक ही लक्ष्य
सामने दिखाई देता है
ऐसा वैसा कैसा भी पैसा
बस, पैसा दिखाई देता है

मैं इतना तेज़ हो भाग रहा
नहीं किसी का साथ चाह रहा
कमजोर पड़ रहा रिश्तों का धागा
तरक्की सिर्फ अब अपनी अच्छी लगती है
बेईमानी साथ साथ बेख़ौफ़ हो चलती है

मैंने अपने छोटे से दिमाग में
कई खाने बना रखे हैं, अब
पहनावे से, जेब की गरमाहट से
मैं लोगों को पहचानता हूँ
किस को कितनी इज्जत देनी है
ये तौल कर तय करता हूँ

सारी उम्र इंसानों में रहा, पर
मेरा ये मैं अपने में ही खोया रहा
अब प्यार भी बनावटी सा लगता है
उसमे भी मेरा मैं, धर्म-जात
अमीरी-गरीबी, नफा-नुकसान देखता है

पहले नींद आ जाती थी
अब नींद को लानी पड़ती है
जीवन के इस आपाधापी में
पलभर की चैन न मिलती है

पहले छोटी छोटी बातों में भी
ख़ुशी का गागर छलकता था
आज बहुत कुछ होते हुए भी, ये
मैं क्यूँ गुमसुम सा रहता है

जीवन बनावटी, हँसी बनावटी
अब मैं इंसान बनावटी लगता हूँ
आज दोस्त फैले संसार में
नहीं अपनों की खबर रखता हूँ

इंसान मशीन बनाते बनाते
स्वयं मशीन बन बैठा है
उसका ये आशियाना अब
बदला बदला सा लगता है

गुरुवार, 31 मार्च 2011

पर्यावरण मित्र

पर्यावरण मित्र बन
धरती की बेचैनी सुन
गाँव शहर हो रहे हैं जर्जर
क्या कहते ये कटते जंगल
टूटते पर्वत, पटता सागर
खाली होता पानी का गागर

संकटग्रस्त हुए हैं हम सब
पिघल रहे हिम ग्लेशियर अब
कल-कल नदियाँ बहती जाती
अपनी व्यथा के गीत सुनाती
सबको जीवन देने वाली
पग-पग दूषित होती जाती

बच्चों सी ये हँसती गाती
कभी न थकती बढती जाती
जीवों की ये प्यास बुझाती
अमृत है ये धरा पे बहती
गंगा ने क्या कभी सोचा था
मानव स्वयं का गला घोंटेगा

आओ बच्चों हाथ बढाओ
पानी का तुम साथ निभाओ
इससे बड़ा न कोई धन है, न
इसके बिना जीवन संभव है
पानी की बर्बादी रोको
दुनिया की तबाही रोको

मानव ऐसा बना कसाई
जंगलों की उसने वाट लगाईं
पहाड़ों की लहलहाती हरियाली
ख़त्म हो रही पक्षियों की खुशहाली
मुरझाया सबका तन मन है
शुद्ध हवा मिलनी मुश्किल है

हमने ऐसा विश्व बनाया
जैवविविधता पर खतरा मंडराया
कई जीव विलुप्त हुए हैं
चीता हमने ख़त्म किया है
गिद्ध बाघ पर खतरा बढ़ा है
गौरया अब दिखती कम है

हमने ऐसा पथ अपनाया
गाय भैंस को मशीन बनाया
सुई लगाकर दूध बढाया
बीटी बीजों का दौर चला है
नया बीज बिल तैयार खड़ा है
किसान तो भैया डूब चला है
पर्यावरण मित्र बनो अब यारों
जैवविविधता को समझो प्यारों

आज ज़माना कैसा आया
प्लास्टिक है हम सबपर छाया
कपडे की थैली भूल गए सब
विकास की दौड़ में रम गए सब
उपभोग का ऐसा दौर चला है
खतरनाक ये शौक चढ़ा है

कचरा इधर उधर है फैला
हमने पृथ्वी को किया है मैला
वस्तुओं की बर्बादी बच्चों
यूँ ही कभी न होने देना
पर्यावरण प्रहरी बनकर तुम
कचरा प्रबंधन की बाते करना

दिखावे ने है सादगी भुला दी
इंसानों में होड़ लगा दी
मुझसे बेहतर न कोई दूजा
चाहे हो शादी, त्यौहार या पूजा
कारों की रोशनाई में अब
साइकिल सुस्कियां लेती है

हमने ऐसी आदत डाली
बेमौसम सब्जी लगती प्यारी
कोई भी ऑफिस ऐसा न दिखता
दिन के उजाले में काम हो चलता
कई गावों में बिजली नहीं, हम
बत्ती बंद करने में भी अलसाते हैं

जहाँ सुहाना हर मंजर है
नहीं उनसे भी प्यार किया
हमने अपनी धरोहरों से भी
है सौतेला व्यवहार किया
पान के छीटें हर कोने में
दीवानों के नाम दीवारों पर
हमने अपनी आदतों से
इनको भी बर्बाद किया

पीड़ा से कराहता, प्रश्नों से जूझता
अपनों को ढूंढता, ये हमारा पर्यावरण

रविवार, 6 मार्च 2011

सीख ले तू

सोच में तू क्यूँ पड़ा है
हार क्यूँ तू मान चला है
जोश फिर तू भर रगों में
गर्म तू कर ले लहू को
देख दूर उस कालिमा,पार
तुझको तेरी मंजिल दिखेगी

देख पथ छोड़, भाग ना तू
जीत की हठ त्याग ना तू
कुछ छलांगे मार और तू
सिंह सरीखा दे दहाड़ तू
बिन लड़े ही जीत कैसी
बात ये फिर याद कर तू

संघर्षों ने ही तो तुझको
पाला और बड़ा किया है
हौंसला रख, कर भरोसा
नहीं कोई दूसरा है तुझसा
चाह ले यदि तू जरा सा
काम कर सकता है बड़ा सा

अपनी इस हक़ की लड़ाई
खुद ही तो लड़नी है तुझको
तू तो अब खुद जग गया है
औरों को भी दे जगा तू
खुद पर ऐतबार केर देख
पा जाएगा मंजिल तू अपनी

याद रखना बात मेरी
समाज नहीं कमजोर की सुनती
शाशक शोषक की अच्छी जमती
योजना, वादे पेट ना भरते
भ्रष्टाचारी अब देश चलाते
मेहनतकश, मजदूर, किसान
और शोषित होते जाते

मुट्ठी को तू बंद कर देख
लड़ने का साहस मिलेगा
ये अँधेरा भी छटेगा
सूर्य फिर फिर ही खिलेगा
तू भी तो इक एकलव्य है
अर्जुनों से क्या खौफ तुझको

द्रोण कई रास्ते में मिलेंगे
खतरों से लड़ना सीख ले तू
मुखौटे पहचानना सीख ले तू
अंधेर भगाना सीख ले तू
अँधेरा मिटाना सीख ले तू
मशालें जलाना सीख ले तू

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

जेनरल टिकट पर पहली यात्रा

बाहर इंजन की भकभक
अंदर हो रही दिलों की धकधक
घंटों से खड़ी रेल अब चल पड़ी
होल्ले होल्ले स्टेशन छोड़ चली
रेंगते चली जा रही रेल की तरह
मेरे अन्दर भी कुछ रेंगने लगा है

सीट पाने के लिए लोग देते पैसे
कुली भी हैं कईयों को खुलेआम लूटते
कुछ को पड़ते पुलिस के डंडे, पर
गाँव जाने की आस में, हैं सब सहते

कई लटक रहे दरवाजों से
कई दुबककर बैठे शौचालय में
तम्बाखू और गुटखे की खुशबु
और बीडी से निकलता धुआँ
महिलाओं की हालत और बदतर
मानो किसी तहखाने में सिमटी जिंदगी

हैरां था मैं कैसे कटेगा ये सफ़र
जब भरे हों लोग इस कदर
अजीब सी फैली गुठल मुथल
सिर पर पैर पैर पर सिर
पसीने से तरबतर सब हैरां परेशां
क्या बच्चे और क्या जवान

पहियों और पटरियों की खटर पटर
अंदर हो रही लोगों की चटर पटर
मेरी घुटन और ऊब को और बढ़ाती
खामोशियाँ तोड़ती बच्चों की बेचैनी


धीरे धीरे खुलने लगी हैं जीवन की कड़ियाँ
मूँगफली के छिलके और घर की बनी पूड़ियाँ
कुछ रिश्ते बनने लगे हैं लोगों में
मनो की खटास भी कम होने लगी
जिन्हें खड़े होने की जगह न दी लोगों ने
अब सिकुड़कर बैठने की जगह कर दी है

ठहाकों और बातों में कई स्टेशन निकल जाते
कुछ देर के लिए लोग अपनी पीड़ा भूल जाते
सफ़र में मस्त हो जाते, कोई गाता गीत
कोई देता जीवन का उपदेश,
कुछ कर रहे हीरो हीरोइनों की बातें
कुछ मुस्त अपने रंगीन सपनो में

धीरे धीर सबकी मंजिल आती जाती
किसी आज़ादी का एहसास कराती
अपनों से मिलकर थकान दूर हो जाती
कड़वी मीठी यादें दिलों में रह जाती

इस पीड़ा से अबतक अनभिग्य, मैं सोचने लगा
क्या इस समस्या का कभी हल निकल पायेगा
कभी आमजन भी इज्जत से यात्रा कर पायेगा
शायद नहीं, क्योंकि बड़े लोग, ख़ास लोग,
शौच को रोकने की पीड़ा से नहीं गुजरते
यात्रा करने के लिए पुलिस के डंडे नहीं खाते
जेनरल टिकट पर यात्रा नहीं करते

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

इंडिया शाइनिंग...फील गुड

आओ बात करें भारत के विकास की
देश को चला रहे मुट्ठीभर ख़ास की
कमजोर पड़ रहे आम समाज की
मजबूत हो रहे पूँजीवाद की

गरीबों को सताते ये बेहिसाब
कई बार होते ये बेनकाब
नहीं लेती सरकार कोई हिसाब
क्या यही है लोकतंत्र का इन्साफ

यही हैं जो बनाते फ़ॉर्मूले
गरीबों को और गरीब बनाने की
अपनी जमीन बचाने की,मजदूर की
मेहनत से मुनाफा कमाने की

कहीं अनाज सड़ जाता है
कहीं कोई भूखों सो जाता है
कारें कंप्यूटर सस्ते हो रहे
मजदूर के बच्चे दूध को रो रहे

पैसे को जोड़कर ये और बनाते पैसे
गरीबों की जेब से घटाते बचे हुए सिक्के
कारखानों को बढाने की फिराक में
ये बैठे हमारे जमीन की ताक़ में

कई सेज इन्होने बनाया,
गाँव तोड़ शहर बसाया
अपने घर में ही गुलाम बनाया
जंगल जलाया, पहाड़ तुड़वाया
बीटी कॉटन का दौर चलाया
किसानो से आत्महत्या करवाया

ये इन्ही की मेहरबानी है
की स्विस बैंक की दिवाली है
हज़ारों अरब नहीं वापस आनी है
देशवासियों से खुलेआम बेईमानी है

खेल से भी कमाने वाले ये लोग
आईपीएल,सी.डब्लू.जी में लगाया भोग
खेल का भी लोगों ने खेल बनाया
पैसे और सियासत ने इसे चलता बनाया

कोर्पोरेट्स की कमाई यहाँ
कई गुना बढ़ जाती है
पल भर में अम्बानी की कमाई
पाँच सौ हो जाती है, कईयों को
दिन भर की मेहनत भी
इसकी आधी दिला नहीं पाती है

ये भारत की ही संसद है,जो
अम्बानी भाइयों के झगडे सुलझाने
में दिन रात एक कर देती है
और किसानों की आत्महत्या पर
चर्चा भी नहीं ठीक से करती है

लोकतंत्र के मायने खो गए कहीं
हमारी आवाजें दब सी गयी कहीं
सरकार लाचार दिख रही कहीं….