सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

जेनरल टिकट पर पहली यात्रा

बाहर इंजन की भकभक
अंदर हो रही दिलों की धकधक
घंटों से खड़ी रेल अब चल पड़ी
होल्ले होल्ले स्टेशन छोड़ चली
रेंगते चली जा रही रेल की तरह
मेरे अन्दर भी कुछ रेंगने लगा है

सीट पाने के लिए लोग देते पैसे
कुली भी हैं कईयों को खुलेआम लूटते
कुछ को पड़ते पुलिस के डंडे, पर
गाँव जाने की आस में, हैं सब सहते

कई लटक रहे दरवाजों से
कई दुबककर बैठे शौचालय में
तम्बाखू और गुटखे की खुशबु
और बीडी से निकलता धुआँ
महिलाओं की हालत और बदतर
मानो किसी तहखाने में सिमटी जिंदगी

हैरां था मैं कैसे कटेगा ये सफ़र
जब भरे हों लोग इस कदर
अजीब सी फैली गुठल मुथल
सिर पर पैर पैर पर सिर
पसीने से तरबतर सब हैरां परेशां
क्या बच्चे और क्या जवान

पहियों और पटरियों की खटर पटर
अंदर हो रही लोगों की चटर पटर
मेरी घुटन और ऊब को और बढ़ाती
खामोशियाँ तोड़ती बच्चों की बेचैनी


धीरे धीरे खुलने लगी हैं जीवन की कड़ियाँ
मूँगफली के छिलके और घर की बनी पूड़ियाँ
कुछ रिश्ते बनने लगे हैं लोगों में
मनो की खटास भी कम होने लगी
जिन्हें खड़े होने की जगह न दी लोगों ने
अब सिकुड़कर बैठने की जगह कर दी है

ठहाकों और बातों में कई स्टेशन निकल जाते
कुछ देर के लिए लोग अपनी पीड़ा भूल जाते
सफ़र में मस्त हो जाते, कोई गाता गीत
कोई देता जीवन का उपदेश,
कुछ कर रहे हीरो हीरोइनों की बातें
कुछ मुस्त अपने रंगीन सपनो में

धीरे धीर सबकी मंजिल आती जाती
किसी आज़ादी का एहसास कराती
अपनों से मिलकर थकान दूर हो जाती
कड़वी मीठी यादें दिलों में रह जाती

इस पीड़ा से अबतक अनभिग्य, मैं सोचने लगा
क्या इस समस्या का कभी हल निकल पायेगा
कभी आमजन भी इज्जत से यात्रा कर पायेगा
शायद नहीं, क्योंकि बड़े लोग, ख़ास लोग,
शौच को रोकने की पीड़ा से नहीं गुजरते
यात्रा करने के लिए पुलिस के डंडे नहीं खाते
जेनरल टिकट पर यात्रा नहीं करते