गुरुवार, 31 मार्च 2011

पर्यावरण मित्र

पर्यावरण मित्र बन
धरती की बेचैनी सुन
गाँव शहर हो रहे हैं जर्जर
क्या कहते ये कटते जंगल
टूटते पर्वत, पटता सागर
खाली होता पानी का गागर

संकटग्रस्त हुए हैं हम सब
पिघल रहे हिम ग्लेशियर अब
कल-कल नदियाँ बहती जाती
अपनी व्यथा के गीत सुनाती
सबको जीवन देने वाली
पग-पग दूषित होती जाती

बच्चों सी ये हँसती गाती
कभी न थकती बढती जाती
जीवों की ये प्यास बुझाती
अमृत है ये धरा पे बहती
गंगा ने क्या कभी सोचा था
मानव स्वयं का गला घोंटेगा

आओ बच्चों हाथ बढाओ
पानी का तुम साथ निभाओ
इससे बड़ा न कोई धन है, न
इसके बिना जीवन संभव है
पानी की बर्बादी रोको
दुनिया की तबाही रोको

मानव ऐसा बना कसाई
जंगलों की उसने वाट लगाईं
पहाड़ों की लहलहाती हरियाली
ख़त्म हो रही पक्षियों की खुशहाली
मुरझाया सबका तन मन है
शुद्ध हवा मिलनी मुश्किल है

हमने ऐसा विश्व बनाया
जैवविविधता पर खतरा मंडराया
कई जीव विलुप्त हुए हैं
चीता हमने ख़त्म किया है
गिद्ध बाघ पर खतरा बढ़ा है
गौरया अब दिखती कम है

हमने ऐसा पथ अपनाया
गाय भैंस को मशीन बनाया
सुई लगाकर दूध बढाया
बीटी बीजों का दौर चला है
नया बीज बिल तैयार खड़ा है
किसान तो भैया डूब चला है
पर्यावरण मित्र बनो अब यारों
जैवविविधता को समझो प्यारों

आज ज़माना कैसा आया
प्लास्टिक है हम सबपर छाया
कपडे की थैली भूल गए सब
विकास की दौड़ में रम गए सब
उपभोग का ऐसा दौर चला है
खतरनाक ये शौक चढ़ा है

कचरा इधर उधर है फैला
हमने पृथ्वी को किया है मैला
वस्तुओं की बर्बादी बच्चों
यूँ ही कभी न होने देना
पर्यावरण प्रहरी बनकर तुम
कचरा प्रबंधन की बाते करना

दिखावे ने है सादगी भुला दी
इंसानों में होड़ लगा दी
मुझसे बेहतर न कोई दूजा
चाहे हो शादी, त्यौहार या पूजा
कारों की रोशनाई में अब
साइकिल सुस्कियां लेती है

हमने ऐसी आदत डाली
बेमौसम सब्जी लगती प्यारी
कोई भी ऑफिस ऐसा न दिखता
दिन के उजाले में काम हो चलता
कई गावों में बिजली नहीं, हम
बत्ती बंद करने में भी अलसाते हैं

जहाँ सुहाना हर मंजर है
नहीं उनसे भी प्यार किया
हमने अपनी धरोहरों से भी
है सौतेला व्यवहार किया
पान के छीटें हर कोने में
दीवानों के नाम दीवारों पर
हमने अपनी आदतों से
इनको भी बर्बाद किया

पीड़ा से कराहता, प्रश्नों से जूझता
अपनों को ढूंढता, ये हमारा पर्यावरण

रविवार, 6 मार्च 2011

सीख ले तू

सोच में तू क्यूँ पड़ा है
हार क्यूँ तू मान चला है
जोश फिर तू भर रगों में
गर्म तू कर ले लहू को
देख दूर उस कालिमा,पार
तुझको तेरी मंजिल दिखेगी

देख पथ छोड़, भाग ना तू
जीत की हठ त्याग ना तू
कुछ छलांगे मार और तू
सिंह सरीखा दे दहाड़ तू
बिन लड़े ही जीत कैसी
बात ये फिर याद कर तू

संघर्षों ने ही तो तुझको
पाला और बड़ा किया है
हौंसला रख, कर भरोसा
नहीं कोई दूसरा है तुझसा
चाह ले यदि तू जरा सा
काम कर सकता है बड़ा सा

अपनी इस हक़ की लड़ाई
खुद ही तो लड़नी है तुझको
तू तो अब खुद जग गया है
औरों को भी दे जगा तू
खुद पर ऐतबार केर देख
पा जाएगा मंजिल तू अपनी

याद रखना बात मेरी
समाज नहीं कमजोर की सुनती
शाशक शोषक की अच्छी जमती
योजना, वादे पेट ना भरते
भ्रष्टाचारी अब देश चलाते
मेहनतकश, मजदूर, किसान
और शोषित होते जाते

मुट्ठी को तू बंद कर देख
लड़ने का साहस मिलेगा
ये अँधेरा भी छटेगा
सूर्य फिर फिर ही खिलेगा
तू भी तो इक एकलव्य है
अर्जुनों से क्या खौफ तुझको

द्रोण कई रास्ते में मिलेंगे
खतरों से लड़ना सीख ले तू
मुखौटे पहचानना सीख ले तू
अंधेर भगाना सीख ले तू
अँधेरा मिटाना सीख ले तू
मशालें जलाना सीख ले तू