रविवार, 6 मार्च 2011

सीख ले तू

सोच में तू क्यूँ पड़ा है
हार क्यूँ तू मान चला है
जोश फिर तू भर रगों में
गर्म तू कर ले लहू को
देख दूर उस कालिमा,पार
तुझको तेरी मंजिल दिखेगी

देख पथ छोड़, भाग ना तू
जीत की हठ त्याग ना तू
कुछ छलांगे मार और तू
सिंह सरीखा दे दहाड़ तू
बिन लड़े ही जीत कैसी
बात ये फिर याद कर तू

संघर्षों ने ही तो तुझको
पाला और बड़ा किया है
हौंसला रख, कर भरोसा
नहीं कोई दूसरा है तुझसा
चाह ले यदि तू जरा सा
काम कर सकता है बड़ा सा

अपनी इस हक़ की लड़ाई
खुद ही तो लड़नी है तुझको
तू तो अब खुद जग गया है
औरों को भी दे जगा तू
खुद पर ऐतबार केर देख
पा जाएगा मंजिल तू अपनी

याद रखना बात मेरी
समाज नहीं कमजोर की सुनती
शाशक शोषक की अच्छी जमती
योजना, वादे पेट ना भरते
भ्रष्टाचारी अब देश चलाते
मेहनतकश, मजदूर, किसान
और शोषित होते जाते

मुट्ठी को तू बंद कर देख
लड़ने का साहस मिलेगा
ये अँधेरा भी छटेगा
सूर्य फिर फिर ही खिलेगा
तू भी तो इक एकलव्य है
अर्जुनों से क्या खौफ तुझको

द्रोण कई रास्ते में मिलेंगे
खतरों से लड़ना सीख ले तू
मुखौटे पहचानना सीख ले तू
अंधेर भगाना सीख ले तू
अँधेरा मिटाना सीख ले तू
मशालें जलाना सीख ले तू

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