रविवार, 15 मई 2011

मैं एक मशीन

वक़्त की पहिया तेज हुई है
रेत सरीखा फिसल रही है
इस फिसलन में जीवन भैया
हिरन सरीखा भाग रही है

देखो दौर है कैसा आया, हमने
वक़्त को है पछाड़ना चाहा
मुट्ठीभर ने पैसों का पेड़ लगाया
दर्जन भर, कईयों को कुचलकर
पैसे तोड़ने में रमे हुए हैं, हम भी
दिलो-दिमाग से इसमें लगे हुए हैं

कहीं औरों से पछड न जाऊं
दौड़ से बाहर न हो जाऊं, इसलिए
अर्जुन सरीखा एक ही लक्ष्य
सामने दिखाई देता है
ऐसा वैसा कैसा भी पैसा
बस, पैसा दिखाई देता है

मैं इतना तेज़ हो भाग रहा
नहीं किसी का साथ चाह रहा
कमजोर पड़ रहा रिश्तों का धागा
तरक्की सिर्फ अब अपनी अच्छी लगती है
बेईमानी साथ साथ बेख़ौफ़ हो चलती है

मैंने अपने छोटे से दिमाग में
कई खाने बना रखे हैं, अब
पहनावे से, जेब की गरमाहट से
मैं लोगों को पहचानता हूँ
किस को कितनी इज्जत देनी है
ये तौल कर तय करता हूँ

सारी उम्र इंसानों में रहा, पर
मेरा ये मैं अपने में ही खोया रहा
अब प्यार भी बनावटी सा लगता है
उसमे भी मेरा मैं, धर्म-जात
अमीरी-गरीबी, नफा-नुकसान देखता है

पहले नींद आ जाती थी
अब नींद को लानी पड़ती है
जीवन के इस आपाधापी में
पलभर की चैन न मिलती है

पहले छोटी छोटी बातों में भी
ख़ुशी का गागर छलकता था
आज बहुत कुछ होते हुए भी, ये
मैं क्यूँ गुमसुम सा रहता है

जीवन बनावटी, हँसी बनावटी
अब मैं इंसान बनावटी लगता हूँ
आज दोस्त फैले संसार में
नहीं अपनों की खबर रखता हूँ

इंसान मशीन बनाते बनाते
स्वयं मशीन बन बैठा है
उसका ये आशियाना अब
बदला बदला सा लगता है

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