सोमवार, 22 अगस्त 2011

कहा पेड़ ने…

कहा पेड़ ने इक दिन इंसान से
क्या जानोगे तुम, है मेरी क्या कीमत
शिव ने पिया था हलाहल एक बार
उनकी पूजा करते रहे हो तुम चिरकाल
मैं जो हलाहल पी रहा हूँ पल-पल
उसकी तुम कीमत,क्या आँकोगे

बना कोई ऐसा नहीं शस्त्र अबतक
प्रकाश संशलेषण से उर्जा बनाने का
करे जो करतब, मैं ही हूँ एकमात्र जीव ऐसा
जो करिश्मा ये निरंतर किये जा रहा हूँ
जो तुझको जीवनदान दिए जा रहा हूँ
लगाओगे तुम बोल मेरी क्या बोलो

चिड़ियाँ बनाती हैं घोंसला मुझपर
कई जीव जन्तुओं का आशियाना है मुझपर
नहीं कोई लालच नहीं कोई गम है
औरों के संग मैं जिए जा रहा हूँ
सबको ख़ुशी मैं दिए जा रहा हूँ
बताओ ऐ बुद्धिमानों मेरी कीमत क्या होगी

मैं देता हूँ छाया, फल भी त्यागता हूँ
तेरे जहर को सोखता जा रहा हूँ
मरकर भी, जलकर तेरे भूखे चूल्हों को
मैं अपनी आग दिए जा रहा हूँ
नहीं बदले में तुजसे कुछ मांगता हूँ
अंदाजा भी नहीं तुझे, मेरी कीमत क्या होगी

कई वार तुने हैं मुझपर किये
नहीं कोई हिंसा मैं जानता हूँ,
तू क्या जाने मेरी पीड़ा क्या होवे
बगावत भी करना नहीं जानता हूँ,
ऐ गद्दार प्राणी, बहुत सब्र हममे है
हमारी क्या कीमत नहीं जानता तू

जो अपना न हो सका वो हमारा क्या होगा
तुझसे कोई उम्मीद तो बईमानी होगी
कम से कम इतना तो एहसान कर दे
हमारी पीड़ा को थोडा तू सुन ले
कुल्हाड़ी और आरी अब बनानी तू बंदकर
हमे भी तो जीने का अधिकार दे दे

बुधवार, 17 अगस्त 2011

इंसानों का समाज

आओ मिलकर बनाए ऐसा समाज
जिसकी जरूरत भी है आज
न हो कोई गरीब लाचार
न ही कोई रहे अमीर, बेकार

निर्भय निडर बने समाज
अडिग रहे न्याय की बात
सब जीयें इज्जत के साथ
सबको मिले अपना अधिकार

न माने इंसान जात- पाँत को
काम मिले हर इक हाथ को
इंसानियत हो लोगों का ईमान-अभिमान
ऐसे नेक राह पर इक दिन चले इंसान

कोई न सोये भूँखे पेट
सबकी आँखों में हो तेज
किसी का भी घर ना हो रोड
न रहे लोगों के दिलों में कोई रोग

बुर्के की कालिमा हट जाए,
घूँघट का कलंक छंट जाए
लड़के की चाहत, दहेज़ की बातें
कल की बातें बनकर रह जाएँ

धर्म जात की बात जहां न हो
न ही भ्रष्टाचार का साथ वहाँ हो
आओ मिलकर डालें यह नीव
नए भविष्य को दें आकार
मिलकर बनायें इंसानों का समाज








गुरुवार, 4 अगस्त 2011

मीठे सपने

आज मैंने खूब साईकिल चलाई
मैं रुका सा, साईकिल की पहियों संग
भागने लगा, मीठे सपनो में खोने लगा
दिन में चंदा संग बातें करने लगा

उसका साथ सफ़र सुहाना बनाता गया
की हमने ढेर सारी बातें,
ताज़ी हो आई धुंधली, भूली-बिसरी
मिश्री सी लगने वाली प्यारी प्यारी यादें

कभी चलती वो मेरा हाथ थामे
कभी उडती हवाओं संग
करती बातें तितलियों से, उसकी
मुस्कुराहट को तरसता मेरा मन

जीवन की कठिनाइयों को
आज हमने पीछे छोड़ दिया
बारिश की बूंदों संग, चाय का
वो स्वाद, मस्त हो चले थे हम

शाम होते-होते थके हम दोनों
मैं पैडल मारते मारते
वो बातें करती करती, पर
रुकना हम दोनों ने न चाहा

रात को सिरहाने आकर उसने
हौले से पूंछा, थक गए क्या
मैं हलके से मुस्काया, उससे कहना चाहा
बस साथ हो तेरा, तो तुझे
साईकिल पर दुनिया की सैर कराऊँ
जीवन के मीठे सपनों में मैं खो जाऊं