बुधवार, 17 अगस्त 2011

इंसानों का समाज

आओ मिलकर बनाए ऐसा समाज
जिसकी जरूरत भी है आज
न हो कोई गरीब लाचार
न ही कोई रहे अमीर, बेकार

निर्भय निडर बने समाज
अडिग रहे न्याय की बात
सब जीयें इज्जत के साथ
सबको मिले अपना अधिकार

न माने इंसान जात- पाँत को
काम मिले हर इक हाथ को
इंसानियत हो लोगों का ईमान-अभिमान
ऐसे नेक राह पर इक दिन चले इंसान

कोई न सोये भूँखे पेट
सबकी आँखों में हो तेज
किसी का भी घर ना हो रोड
न रहे लोगों के दिलों में कोई रोग

बुर्के की कालिमा हट जाए,
घूँघट का कलंक छंट जाए
लड़के की चाहत, दहेज़ की बातें
कल की बातें बनकर रह जाएँ

धर्म जात की बात जहां न हो
न ही भ्रष्टाचार का साथ वहाँ हो
आओ मिलकर डालें यह नीव
नए भविष्य को दें आकार
मिलकर बनायें इंसानों का समाज








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