रविवार, 27 नवंबर 2011

शिक्षा की बढती खाई

एक समय की बात है
हुई दो बच्चों की मुलाकात है
दोनों में बहुत चली बात है
मौजूद कुछ बातें तथ्यों के साथ है

कान्हा बोला कन्हैया से
मैं पढता बड़े से स्कूल में, जहाँ
मुश्किल से मिलती एड्मीशन
टीचर्स हमारे बड़े ही ज्ञानी
विषयों पर उनकी पकड़ निराली

खूब लगन से मैं हूँ पढता
क्लास्सेस जाता कोचिंग जाता
इंग्लिश में मैं बातें करता
नब्बे के ऊपर मार्क्स मैं लाता

कन्हैया बोला कान्हा से
मैं पढता सरकारी स्कूल में
हमारे शिक्षक भी बड़े हैं ज्ञानी
मैं भी खूब लगन से पढता
बात भले मैं बड़ा न करता
धरातल का ज्ञान हूँ रखता

कान्हा बोला, धरातल के ज्ञान से
क्या तुम मर्सडीस खरीद पाओगे
या कभी टाटा अम्बानी ही बन पाओगे
हम से आगे कभी निकल न पाओगे
हम से उलझकर बच्चू पछताओगे
पढना न पढना है बेकार तुम्हारा
फोर्थ क्लास की नौकरी ही तो पाओगे, या
कहीं किसी कसबे में रिक्शा ही तो चलाओगे

ऐ.सी. कमरे में हम पढ़ते
इन्टरनेट पर बातें करते
हैकिंग त्विटिंग आती हमको
वीडिओ गेमिंग भाती हमको
कंप्यूटर के ज्ञाता हैं हम
ज्ञान में तुमसे भ्राता हैं हम
आज हमारी मुट्ठी में है
कल के भाग्य विधाता हैं हम

कन्हैया ठनका….
कल के भाग्य विधाता तुम कैसे ?
ज्ञान में हमारे भ्राता तुम कैसे?
फिर वह थोड़ी सोच में पड़ा
याद आई उसे अपने स्कूल की दुर्दशा
वो टूटी फूटी फर्श, दीवारों पर लगे जाले
शौचालय पर लगे ताले, टूटी हुई ब्लैक बोर्ड
और टूटी हुई खिड़कियाँ दरवाजे
टूटे हुए मास्टरजी मेज पर पैर फैलाये हुए
और टूटे हुए बच्चे अपने में ही खोये हुए

उसे याद आया स्कूल के सामने ही
बना सुन्दर सा एक मंदिर, मंदिर में
सोने का मुकुट पहने बैठे कन्हैया
और अपने स्कूल की दुर्दशा
जहाँ गायों को चरवाते चरवैया
उसे याद आया स्कूल का वो सुखा हुआ नल
पानी पीने के लिए घर भागते बच्चों का दल

यह सब सोच वह थोडा गंभीर हुआ
फिर हिम्मत कर कान्हा से बोला
तुम किसी भ्रम में हो जी रहे
या वीडिओ गेम की तरह ही,
हो बनावटी दुनिया में खो गए
जीवन के इस खेल में हम से न कभी
जीत पाओगे, एक ठेंस लगने पर ही
बड़ी सोच में पड़ जाओगे
जीवन का संगीत है हमने जाना
प्रकृति को हमने है पहचाना
फोर्थ क्लास ही नहीं हम
फर्स्ट क्लास भी बनते हैं

माना सुनहरा आज तुम्हारा है,पर
तुमने अधिकार तो छीना हमारा है
मत भूलो अपने हौसले के बल पर ही
कछुआ खरगोश से जीतता है
हमे हमारा सुनहरा कल अब
और समीप दिखाई देता है

ये सब सुन कान्हा मुस्काया
अपने तरकश से इक तीर चलाया
हमको हर विषय के शिक्षक मिलते
खेल कूद के अवसर मिलते, क्विज़,
ओलंपियाड, कांग्रेस के हिस्सा बनते
विदेशों में हम टूर पर जाते
मॉडल्स बनाते प्रदर्शनी लगाते

टीचर्स कभी न पनिशमेंट देते
अपने बच्चों सा है समझते
पढना लिखना तुम क्या जानो
जाओ जाकर प्रकृति को पहचानो
खेती करो और भैंस चराओ
अपना जीवन गाँव में बिताओ


कन्हैया थोडा उदास हुआ
कुछ डर का उसे आभास हुआ
पड़ा बड़े ही सोच में वह…
स्कूल में हमारे मास्टर एक
हाथ में उनके रहती हरदम एक बैंत
अपने बच्चे सा क्या समझेंगे
बात बात में मुर्गा बनाते
पान तम्बाखू हैं वो चबाते
कभी कभार इमला लिखवाते

फिर भी उसने हार न मानी
था तो वह भी अभिमानी
उसने बोला कान्हा से
जीवन से हमने ज्ञान लिया है
मेहनत से हमने काम लिया है
मैं तुमसे बतियाऊंगा, जब
एक बड़ा डॉक्टर बन जाऊँगा

कान्हा बोला डॉक्टर बनना
है कोई बच्चों का खेल नहीं
डॉक्टर और तेरा, है कोई मेल नहीं
डॉक्टर मैं बनकर दिखलाऊंगा
तेरे गाँव के पास वाले शहर में
एक आलिशान अस्पताल बनवाऊंगा
और चालीस साल में बुड्ढा हो जब
तू मेरे पास ही आएगा, अपना इलाज
करवाएगा, तब मैं तुमसे बतियाऊंगा

कन्हैया शुन्य में विलीन, उसे याद आई
सर पर बोझा ढोते अपने बाप की
रिक्शा खीचने वाले अपने साथ के यार की
चूल्हे के धुवें में धुंधली सी दिखती अपने माँ की
दुबले पतले अपने गाय की, बेजान से अपने गाँव की

थोडा मायूस हो कन्हैया बोला कान्हा से
नई कोई बात नहीं कही है तुमने
नई कोई चाल नहीं चली है तुमने
सदियों से है चली आ रही रीत
एकलव्यों को पीछे रखना और
अर्जुनों से करना अच्छी प्रीत
अब और नहीं बर्दाश्त करेंगे हम
अपनी आवाज़ को और बुलंद करेंगे हम

बातें दोनों की ख़त्म हुई
मेरी आँखें भी द्रव्य हुईं
मैं सोच में पड़ा ….
भारत का भविष्य आज
पल रहा ऐसे ही बेजान स्कूलों में
शिक्षा की खाई इस कदर बढ़ गयी है
मित्रता की बात दूर, नहीं है यकीन
कभी किसी कान्हा और किसी कन्हैया में
इस कदर बात भी हो सकती है

कन्हैया जैसे बच्चों के दम तोड़ चुके सपने
आसुंओं के साथ ख़त्म हो चुकी उनकी इच्छाएं
वो कहना चाहते हैं की उन्हें आज
सरकार के साइकिल, कुछ पैसे वजीफे के
दोपहर के भोजन से मुफ्त की किताबों से
कहीं कहीं ज्यादा जरूरत है
अच्छे स्कूल की, अच्छे मास्टर की
अच्छे पढने के माहौल की

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