रविवार, 15 जनवरी 2012

इज्जत से सफ़र करने का हक़

अपने में समेटे चन्द लोगों से, रेलगाड़ी
बयाँ करती सच इस समाज का
अमीर गरीब, हिन्दू मुसलमां
बैठते सब सवारी एक ही गाडी में

उच्चवर्गीय धनाढ्यों का वर्ग
ये जब कभी सफ़र करते हैं
तो फर्स्ट क्लास में ही चलते हैं
इनके पास है ढेर सारा कैश
जिंदगी में है ऐश, सफ़र में भी ऐश

लोगों में इनके लिए है खूब इज्ज़त
फिर चाहे हो दफ्तर या रेलगाड़ी
ये मैडम और सर ही कहे जाते हैं
टी.टी भी खूब अदब से पेश आते हैं

ये अपना सब हक़ जानते हैं,
और मुसाफिरों के हक़ से इन्हें क्या
मजदूर इनकी फैक्ट्री में मरे तो मरे
अपनी नींद नहीं हराम करते हैं
उनकी ऊँची आवाज़, इन्हें बर्दाश्त नहीं
सफ़र में भी कोई परेशानी इन्हें बर्दाश्त नहीं
रेल की आवाज़ भी इन्हें बर्दाश्त नहीं

हमारा उभरता हुआ मध्यम वर्ग
फील गुड, इंडिया शाइनिंग का मध्यम वर्ग
यूथ फॉर इकुअलिटी का नारा बुलंद करने वाले
बहुत ही जागरूक, सलीकेदार

अपने हक़ के लिए लड़ मिटने वाले,
इनके सफ़र का भी सरकार खूब ख्याल रखती
वातानुकूलित बोगी इनके लिए ही होती है
पहले तो बोगी को एकदम है चिल्ल करती
इनके ठंढे पड गए लहू को गर्म करने के लिए
बेडरोल के साथ कम्बल भी है दिया करती

भाषणों और कलम से चिंता व्यक्त करने वाले
इन्हें, किसी क्योटो प्रोटोकाल से क्या मतलब
ये तो अपने ही दुनिया में जीते हैं
लिबरेशन की बातें किया करते हैं
कोई गरीब इनके कोच में घुस जाए, तो
इनके लिबरेशन पर धुंध सी छा जाती है

हमारा संभलता हुआ निचला मध्यम वर्ग
अमीरों में शामिल होने को बेताब
कई दुविधाओं से घिरे हुए, ये लोग
वातानुकूलित में अपग्रेड होने की आस लगाये
शयनयान में सफ़र करते हैं,
जरूरत पड़ने पर गरीबों के साथ भी
अपना सामंजस्य बना लेते हैं
जेनरल बोगी में भी ये सफ़र कर लेते हैं

हीन भावना से ग्रस्त अक्सर मैं भी
शयनयान में सफ़र करता हूँ,
यह भय बना रहता है, कहीं कोई
परिचित न मिल जाए और पूँछ बैठे
अब भी स्लीपर क्लास…

अंत में कुछ डिब्बे जेनरल बोगी के
उन लोगों के लिए जोड़ दिए जाते हैं
जो कभी इंडिया शाइनिंग का हिस्सा
नहीं बन पायेंगे, क्यूंकि ये वो लोग हैं
जिनके सफ़र और रोज के सफ़र (suffer) से
हमें कोई मतलब नहीं,

इन्ही डिब्बों में ठूंस ठूंस कर भर दिया जाता है
पत्थर तोड़ रेल की लाइन बिछाने वाला
झुग्गी झोपड़ियों में जीने वाला सर्वहारा,
इनके जीवन के सफ़र की तरह ही, इनका
किया हुआ हर सफ़र भी अपने आप में
इतिहास बन जाता है, जो सालों तक
खट्टी तीखी यादों की याद दिलाता जाता है

इनके घरों में ही शौच नहीं तो
ट्रेनों में शौच की सुविधा क्यूँ मिले,
ये झुग्गियों में बिजली, पानी के लिए
जब कईयों की जेबें भरते हैं
तो गाडी में सीट पाने के लिए
रेलवे पुलिस की जेबें भरें

आराम और इज्ज़त से सफ़र
करने का हक़ इन्हें क्यूँ मिले
कहीं इनकी आदत बिगड़ गयी तो
रेलवे या देश तो ऐसे तरक्की कर चुका
हमारी, अमीरों की, कोर्पोरेट्स की
विचारशील, गंभीर सरकारें

हमारे गाड़ियों में भी खूब अंतर
गाडी गर बीमारू प्रदेश की है
तो गाडी भी बीमारू ही रहती है
लोग बीमारू, गाड़ी बीमारू
हिसाब बराबर

रेल के सफ़र की एक अच्छी बात
यहाँ जात-पाँत, धर्म मज़हब पर
थोड़ी धुन्धलाहट सी छा जाती है,
इस धुंध से भी लोग बाखूबी लड़ लेते हैं
आपसे आपका पूरा नाम पूछकर …