शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

बसने और उजड़ने की कहानी

किसी शहर के बाहर वीरान सा
लावारिस पड़ा जमीन का टुकड़ा
वो न शहर का न शहर उसका
यहीं डाल दिया जाता शहर का कचड़ा

मिट्टी में घुल मिलने को बेताब
अपने आखिरी पड़ाव पर पड़ा, कचड़ा
पन्नियाँ, टूटे फूटे बर्तन, सडती गलती सब्जियां
उनपर भिनभिनाती मक्खियाँ
कुत्तों और सूअरों की घूमती टोलियाँ
सबकी गाह, यह जमीन का टुकड़ा

एक दिन इस जमीन की किस्मत भी जागी
काम की तलाश में लोगों की टोली वहाँ पहुँची
और रहने के लिए जमीन से इजाज़त माँगी
फिर क्या, शहर के कचड़े से उनकी मुठभेड़ हुई
सालों साल, कई साल दोनों में जंग चली

छत के इंतज़ाम में लोगों ने दिन रात एक किया
बच्चा-बूढा सबने जो बना वो इंतज़ाम किया
बंजर सी सडती जमीन को तराशना शुरू किया
सूरज से लालिमा ली, बादल से कालिमा ली
कलेजे की आग और पसीने के पानी से
उस धरती को रंगना शुरू किया

उन्होंने धरती को पाटना शुरू किया
साथ ही कईयों की जेबे भी पाटीं
हरी ताज़ी नोटों से, मिलकर लूटा
शहर के रखवालों ने खूब लूटा

कई सर्द रातें इन्होने जाग कर काटीं
जेठ की नंगी शैतान दुपहरिया
इनके हौसले को देख डरकर भागी
कई भीगती शामें इन्होने आपस में बाँटी
पर जीत आखिर विश्वास की हुई
और उनकी सुनहरी सुबह खिली
उथल पुथल भरी, मरती धरती को
उन्होंने समतल और रंगीन बना दिया

कुछ साल यूँ ही बीता, फिर
शहर का जागरूक, शिक्षित वर्ग चेता
और कुछ फुस्फुसहात शुरू हुई
उन्हें इन लोगों की अब बू आने लगी
कोई अनजान सा डर उन्हें सताने लगी
हैरानी और जलन भी साथ साथ हुई

कल तक जो कूड़े का ढेर था
आज वहाँ एक बस्ती खड़ी है
लावारिस जमीन का टुकड़ा
अब उन्हें अपना लगने लगा, उन्हें
वो नोट छापने का जरिया दिखने लगा
बस्ती को तोड़ टाउनशिप बनाया जा सकता है
उसे गोल्फ कोर्स से सजाया जा सकता है

फिर क्या था ताकत की बाहें चौड़ी हुईं
लालच का समंदर उफान मारने लगा
डर को जलन का भी साथ मिला
फिर जो हुआ वो इतिहास बना

बस्ती पर बुलडोज़र चलवाया गया
जलियांवाला फिर दुहराया गया
आज फिर अमीरों की आवाज में
गरीबों की गुहार दबाई गयी

कुछ के लिए नयी सुबह हुई
कुछ का पूरा संसार मिटा
कुछ की उँगलियों में नोटों की
फरफराहट खिली, कुछ
बच्चों का बिलखना भी खूब खिला
कुछ लोग खूब मजे से सोये
कुछ लोगों को नींद गिरवी रखनी पड़ी
अपनी खँडहर के हिफाज़त के लिए

ये मामला मेरे पल्ले न पड़ा
पहले लोगों को बसने दिया गया
उनसे खूब कमाया गया
जब सब बढ़िया हो गया तो
उन्हें वहाँ से हटाया गया

कहीं ये सोची समझी साजिश तो नहीं
जिसमे जाने अनजाने हम सब शामिल हैं
नहीं जानता मैं, कुछ भी नहीं जानता
या नहीं बोलना चाहता, मैं
शहर का वफादार, जिम्मेदार नागरिक