शनिवार, 7 अप्रैल 2012

एक्ठोर प्याला और बनायें

कि दो प्याला ही ख़तम हुआ है
तूने किधर को जाने का रुख किया है
घर तो तू रोज ही जाता है
थक तो रोज ही जाता है
ये रिश्तों की जंजीरें देख, इनमे
उलझ तो रोज ही जाता है

देख अभी तो पीना शुरू हुआ है
खुमारी चढ़नी अभी बाकी है
आधी रात ही तो जवां हुई है
आधी बोतल अभी बाकी है

कि बैठ जरा तू फुर्सत से
कुछ अपनी कह कुछ मेरी सुन
ये रात हमारी अपनी है
पैसा तो रोज कमाना है

कि एक्ठोर प्याला और बनायें
बिसरी यादों को जगा तो लायें
जो हम लोगों की कहानी हो
जिसमे खुशियों की रवानी हो
थोडा पियें थोडा पिलायें
कि, यारा फिर से मुस्कुरायें

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