मंगलवार, 28 अगस्त 2012

ज्वाला अबहीं दहकत बा


हो देखा….
भागत बा लइके उ नईकी कम्पनिया,
हमरी गढ़की  कमईया, निक्की जमिनिया,
मेहनत की फसलिया, बैमनकी कंपनिया रे 

की आइल बा फिर से लाट्साहेबन कै जमाना 
अब त कार्पोरेट्स कै कहना तू माना
की देशवा गुलाम भइल, अमीरन क काम भइल 
हमरे पचन कै ना कौनो ठिकाना 

कि जोर जुलुम कै इ होखे जमाना 
सरकार कै खाली अब बात बा लुभाना 
कि पैसा से पैसा बनावत हैं लोगां
और मुरख जनता के लुभावत है ढोंगा

कि जान लिहा, इ खुला बाज़ार बा 
कि इहाँ सब कुछ आज बिकात बा 
कि मान ईमान कै कौनो चिन्हार ना
और मेहनत क कीमत कै कौनो बुझार ना 

कि कहले भरे से काम चली ना 
अरे सहकर जिए कै रीत चली ना 
कि अब तौ कूदक पड़ी मैदनवा में 
कि मीता लडक पड़ी संगठनवा में 

कि तोहरे मेहनत कै कमईया अमीरन कै घरमा 
काहेले अबहीं महकत बा 
कि लड़ाई है तोहरा त तुहीं कै लडक बा 
कि इ दुनिया मितवा, बड़ी जहन्नुमा बा 

कि झुककर चलैका कौनो गरज नाही 
हिम्मत करा और आगे बढ़ा भाई 
कि आई उ दिनवा जब हमरहु घरमा 
मेहनत कै रोशनाई जगमगाई हो  

कि दिखावा अंगूठा और मारा दुई घूँसा 
कि नवाबियत इनका, आपन गुलामियत बा 
कि उठावा हथौड़ा और धरा दस ठौरा, कि देखा
तोहरे भीतर ज्वाला अबहीं दहकत बा