सोमवार, 17 सितंबर 2012

आओ आज कुछ क्रांति की आवाजें सुने


चलो आज कुछ हटकर बातें करते हैं 
की आओ आज फिर छान बीन कुछ करते हैं 
की आज गाँव को हम रोमानी चश्मे से न देखेंगे 
न ही उडती तितलियों में जीवन के रंग हम ढूँढेंगे

आओ आज खुली आखों से अपने गाँव को देखते हैं 
अन्धकार में जीते, भूख से लड़ते लोगों से 
कुछ देर के लिए तो मिलते हैं,
की आओ आज, जजमानी के फैले जाल 
और जमींदारों के सतरंज के चाल को 
समझने की थोड़ी कोशिश तो करते हैं 

आज हम इज्जत शोहरत की बातें नहीं करेंगे 
न ही चाँद की शीतलता का बखान ही गायेंगे 
न ही ताज की खूबसूरती का जिक्र होगा, आज
जिक्र करेंगे असंवेदनशील मध्यमवर्गीय बीमारों की 
गोदामों में सड़ते अनाज की, और कचरों के ढेर पर
उग आई उन तमाम बस्तियों की 

आज हम थोड़ी हिम्मत करेंगे, ए. सी कोच में
नहीं चढ़ेंगे, जेनरल कोच में ही सफ़र करेंगे 
और जानेंगे की चंद पैसों के अंतर से ही कैसे 
हम इज्जत से सफ़र करने का हक़ खो देंगे 
और अगर बर्दाश्त कर पाए, तो ये भी जानेंगे की
घंटो शौच न जा पाने की पीड़ा कैसी होती है 

आज न ही बात करेंगे सलीके की और नजाकत की 
कि इनसे अमीरियत की बू आती है  
तो आज हम चंडीगढ़ की साफ़ सुथरी या 
लखनऊ की तहजीब वाली गलियों से नहीं गुजरेंगे
आज हम मरते हुए छोटे कस्बों की सैर करेंगे 
जहां पेड़ों के नीचे बच्चे आज भी पढ़ते हैं 
और जहां के अस्पतालों में ही कई रोग पलते हैं 

आओ आज थोड़ी और हिम्मत करते हैं, की जरा
मेहनत करने वालों की झुग्गी की तरफ चलते हैं 
जहाँ मजदूर और राजमिस्त्री हमारे सपनों को 
साकार करते हैं, और हम उनके सपनों का
कहीं जिक्र भी नहीं करते हैं 
जहाँ सुबह उठने पर पता चलता है की 
चूहा बचा अनाज खा गया, और मूंस
मजदूर के पैर कि उँगलियाँ ही चबा गया 

आज हम सिटी मोंटेसरी के बच्चों के कशीदे नहीं पढेंगे 
उनको विदेशों की यात्रा पर जाते देख गर्व से नहीं फूलेंगे 
आओ आज चलते हैं, जरी या चूड़ियों के कारखानों में 
जहाँ बच्चों के बचपन के साथ खेला जाता है, और उन्हें 
बस मजदूरी करने के लिए ही तैयार किया जाता है  

आज हम सपनों की बातें नहीं करेंगे 
न ही महबूब की जुल्फों में खोएंगे 
आओ आज खोते हैं सच की दुनिया में 
आओ आज जीते हैं रिक्शेवाले की दुनिया में 
जो सोता भी है रिक्शे पर, खाता भी है रिक्शे पर 
हमे ढोता भी है रिक्शे पर,और रोता भी है रिक्शे पर 

आज आपको कुछ खूबसूरत या रोमानी, या
रोमांचकारी हासिल न होगा, पर शायद
हम देख पाएँ अपने जमीन की हकीकत 
अपने समाज की असलियत, कि ये तो सिर्फ
हकीकत के कुछ नमूने हैं, ऐसे कई पेंचीदा
सच्चाइयों से हमने अब तक मुह मोड़े हैं 

आओ आज थोडा सच्चाइयों को जानने की कोशिश करें 
कि रमेश की रामेसरा बनने की कडवी कहानी सुने 
की कब तक हम शांति अहिंसा के किस्से सुनते रहेंगे 
की आओ आज कुछ क्रांति की आवाजें भी सुने 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें