रविवार, 9 दिसंबर 2012

चाय चाय चाय…


चाय का कोई वक्त नहीं
चाय तो बस मस्त कर देती है
सख्त दिमाग को खुशनुमा कर देती है
कई दर्द भाप बन उड़ जाते हैं
चाय संग कई बात बन जाते हैं 
चाय पर कई जज़्बात खिल जाते हैं 

बन चुकी है अब ये आदत
कि चाय हमारी मेहमान-नवाजी
और हमारे तहजीब में आती 
कि बातों बातों में बन जाती है चाय
और बातों बातों में उड़ जाती है चाय
कई फलसफे बन जाते हैं चाय पर
कई किस्से उभर आते हैं चाय पर 
कई अफसानों का गवाह बनता है चाय
और कई रिश्तों की शुरुआत होती है चाय 

कि चाय के हैं शौक़ीन कई
जिनको उसकी क़द्र बड़ी
कि चाय के जायके कई
उसे बनाने के तरीके कई
कोई पीता कड़क, कोई हलकी
कोई अदरक वाली, तो कोई ज्यादा मीठी  
किसी को भाति नीम्बू वाली
तो किसी को जँचती सादी ताज़ी 

पर वो जो पिलाते हैं चाय  
जीभ ही नहीं दिल भी जल उठता है
चाय की गरमाहट और चुस्ती ठंढ पड़ जाती है
जब खौलते पानी में डिप के साथ
शक्कर मिला दी जाती है, और
ऊपर से दूध डाल दिया जाता है

वो अमीरों की चाय
अमीरों की तरह मस्त दिखती है
पर पीने पर बड़ी ही फीकी लगती है
कि उनकी चाय भी पियो तो सलीके से
कप उठाओ तरीके से, और
चुस्की लगाओ नजाकत से
कि कहीं आवाज न निकल जाए 

पर अब आवाज तो निकलनी है
कि एक बात चिर सत्य है 
चाय बागानों में हो रहा
मजदूरों का शोषण अनंत है 
कि घर घर तो पहुँच चुकी चाय 
और बागन के मजदूरों को
अभी भी नहीं मिला न्याय 


4 टिप्‍पणियां:

  1. चाय का बहुत सुंदर विश्लेषण .... और अंत तक आते आते चाय बागान के मजदूरों के शोषण के प्रति चिंता .... गहन प्रस्तुति

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  2. बहुत सही बात कही है आपने .सार्थक भावपूर्ण अभिव्यक्ति बधाई भारत पाक एकीकरण -नहीं कभी नहीं

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  3. सार्थक बहस की शुरुआत की है इस रचना के द्वारा ...
    लाजवाब ...

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