शनिवार, 16 मार्च 2013

मजदूर अब अड़ा है


मजदूर के ग़मों के
हम पास न भटकते
करता है काम दिन भर
खैरियत न उसकी लेते 

करता अरमाँ हमारे पूरे, हम
अहसान भी ना मानते
वो है हमारी जरूरत, हम
उसकी पहचान भी न जानते 

क्या ख़ाक उसको मिलता
बस फाक पर वो चलता
दिन भर है आखिर खटता
शब् शराब में पिघलता 

नींद भी तो आखिर, जालिम
मजदूर को सताती
अमीर को तो बस, ले
अपने गोदी में सुलाती 

हमारे ख्वाब वो सजाता
अपनी न देख पाता 
फुरसत कहाँ उसे, जो
घर अपना वो बसाता 

मजदूरी भी तो देखो, बस
पचास में है निपटाते
बहुत हो गया तो
सौ दो सौ दिए जाते

उसपर भी जुल्म कितना, सबको
मजदूर काम-चोर नज़र आते
रखते नज़र कड़ी हैं, कि कहीं
मिल जाए न उसे, फुर्सत की चंद साँसे

बचपन से उसमे ज्वाला, उसका
ईंट-गारों में लगता रहा अखाड़ा, वो
होता गया आवारा, खोता गया बिचारा,
बस तीस ढलते ढलते छाने लगा बुढापा 

सुनते थे की मेहनत से तो
तकदीर बदलती है, और
पसीने की कमाई से तो
जन्नत ही मिलती है 

वाह! झूठ है ये सब तो,
बकवास लिखा गया है 
मजदूर का तो बस
हक ही मारा गया है 

शातिर है ये ज़माना, बड़ी 
तरकीब से चाल चल रहा है 
मजदूर की मेहनत पर, रोटी
कोई और सेंक रहा है 

अमीर की इक कोठी, और सज रही है
मगर वहाँ से देखो, कैसी बू आ रही है
क्या मजदूर के सितम की इक दास्ताँ
और लिखी जा रही है?

बहुत हो गया अब ये
जुल्म सहते सहते, की 
मेहनत तो बस मेहनत का
हक मांगने लामबंद खड़ा है

अमीर के सामने मजदूर अब खड़ा है 
अपने हक़ के वास्ते अब वो अड़ा है 

5 टिप्‍पणियां:

  1. आप की ये सुंदर रचना शुकरवार यानी 22-03-2013 की नई पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं।
    आप के सुझावों का स्वागत है। आप से मेरा निवेदन है कि आप भी इस हलचल में आकर इसकी शोभा बढ़ाएं...
    सूचनार्थ।

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  2. Dhanyawaad Kuldeep Ji,

    Is Prayas me hum jaroor shaamil honge

    Sanjay

    उत्तर देंहटाएं
  3. baki sab to theek hai kintu ek bat kahoon sachchi hai bilkul-neend keval gareeb ko hi aati hai ameer kee neend to goliyan kha jati hai .बहुत सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति .आभार मृत शरीर को प्रणाम :सम्मान या दिखावा .महिलाओं के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

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  4. Shalini Ji review ke liye bahut bahut Dhanyawaad,

    Gareeb ko tapti garmi me maccharon ke saath, ththurti thandh me ek patli shaal ke sath aur barsaat ke umas me aaram ki neend to shayad hi aa sakti hai par ameeron ke paas neend ke liye acche saadhan to hai hi saath me branded drinks aur neend ki goliyan

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  5. मज्जूर और मज्लूम मज्दूर के दर्द को आपने बडी बेबाकी के साथ सामने रखा है. आज जब चारों तरफ पूँजीवाद की जयजयकार हो रही है यह काफी सुकून देने वाला है कि कोई मज्दूरों की बात कर रहा है.

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