रविवार, 7 अप्रैल 2013

डॉक्टर - तेरे पेशे में अब राज कई


तेरी इबादत सब कोई करता
काम नेक तू बड़ा है करता
तू कुशल बड़ा, तू ज्ञानी बड़ा
हम सबकी जान बचाता तू

आशा का दूजा नाम तु ही
तुझ पर कईयों की आस बड़ी
इश्वर सी तुझमे आस्था है
जीवन दाता कहलाता तू 

तू जादूगर, तू मायावी
तू चमत्कार करता बड़े
तू आज का नया वैज्ञानिक है
तू धर्म जात से है परे

लेकिन हो रहा सब उलट पुलट
बीमार, निरुपाय सा दिखता है
की क्यूँ तू यहाँ से पढ़ लिखकर
विदेश में जाकर चमकता है

आदर्शों का पुल कैसे तू
तोड़ कदम बढाता है
गाँव न तुझको अनुपम लगता, न ही
कस्बों में इलाज करना सुहाता है

अपने ही करतूतों से, तूने
दामन अपना रंगीन किया
पैसे के खातिर ऐ जालिम
कईयों को ग़मगीन किया  

आसुओं और चीत्कारों का
तू मोल न अब समझता है
तू मोल-तौल और कागज़ में
बस डूबा-डूबा सा रहता है

दौलत के आगे तूने भी
देख घुटने टेक दिए
दवा देने वाले हाथों ने
देख कितने खून किये

तूने कितने ही बचपन मारे
कितने ही रैकेट चलवाए
तूने ही तो अमीरों के लिए
गरीबों के अंग बिकवाये

तेरे चौखट पर कितनो के
दम यूँ ही निकल जाया करते
तू कैसा रे जीवन दाता
जीवन का मोल न समझता तू

तुझ पर घोटालों के गाज कई
तेरे पेशे में अब राज कई
इलाज तो तूने महंगा किया
गरीबों का जीवन गिरवी किया

मानवता को तू भूल रहा
अब तू मशरूफ कमाने में
तेरी इज्ज़त है खतरे में
तेरा पेशा अब अधरों में 



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