शनिवार, 11 मई 2013

गर्मी से झुलसते लोग


है अचानक ताप इस धरती की यूँ बढ़ने लगी 
चिलचिलाती धूप से हिम्मत यूँ पस्त होने लगी 

सड़क पर पहुँचा तो काला नाग पिघला लग रहा था 
एक भी बूटा नहीं, शहर सारा टूटा लग रहा था 

आदमी तो आदमी है कुछ तरीका ढूँढ लेगा 
उन परिंदों की तो सोचो, जो बेजुबाँ सब सह ही लेगा 

हम तो प्यासे न मरेंगे, हम तो गर्मी से लड़ेंगे 
उन करिंदों की तो सोचो, जो घरों से चल दिए हैं 

चिपचिपाहट भी बढ़ी है, प्यास तगड़ी सी लगी है 
उन पहाड़ों पर तो देखो, बर्फ हारी बह चली है 

चलते चलते कुछ दिल में यूँ खयाल आया 
हाय! काश मिल जाती कहीं पेड़ों की छाया 

बैठ कर आराम फरमाते पल दो पल, छांह में 
लिख जाता मैं कोई मीठी सी ग़ज़ल 

पास ही कोठी से ए.सी. बाहर गर्म हवा फेंकते दिखा 
और आराम फरमाते लोगों का जुल्मा भी दिखा 

यह देखकर आखों में खून उतर आया मेरे 
गर्मी से झुलसे लोगों का अक्स नज़र आया मुझे 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें