सोमवार, 19 अगस्त 2013

ख्वाहिशों पर काबू रख पाते

हम भी गुलाम न बनते इस दुनिया में
हम भी गुमनाम न होते इस दुनिया में
कुछ न कुछ तो खैर कर गुजर जाते
गर बेचे न होते ख्वाब अपने दिल के 

हम भी खुश होते औरों को खुश पाके
क्या बिगड़ जाता जो रह जाते फांके खाके
फ़क़ीर कहलाते औ अमीर दिल से हो जाते

जो काश, खुद की  ख्वाहिशों पर काबू रख पाते