मंगलवार, 17 सितंबर 2013

रिक्शेवाला

अमीरी की कोख में बेईमानी नज़र आती है
इसकी कमाई में ईमानदारी नज़र आती है
पर कहना क्या इस दुनिया का, ये तो
अमीरी को ही पालने में खिलाती है

सपने अपने बेच बड़ा हुआ वो
अपने दम पर खड़ा हुआ वो
ज्यादा कुछ है पास न उसके, मेहनत अपार
पर इज्ज़त देखो साथ न उसके

उसे लोगों को ढोते देखा
रिक्शे पर ही सोते देखा, रोते देखा
जवानी से बुढापे में, उसको
रिक्शे पर ही ढलते देखा

पीठ से मिलते उसके पेट को देखा,
पसीने से सने पक्के रंग के कपडे में लिपटे देखा
उसे हँसते देखा और हाँफते भी देखा
नहीं कभी किसी कारवाले पर चिल्लाते देखा

ये शहर मुर्दों का शमसान लगता है
दरख्तों में परिंदों का रेला अब नहीं बसता है
यह शहर है अमीरों की और नवाबों की
कि यहाँ रिक्शेवालों का कोई बसेरा नहीं होता है 

भद्र लोक भद्र समाज
अभद्र नीति अभद्र व्यवहार
आहत समाज आहत समाज
अब हो ललकार अब हो यलगार