मंगलवार, 12 नवंबर 2013

लोकतंत्र को घुटनों बल मुर्दा देखा

साहबों कि औलादों को बाप सा ही बनते देखा
कितने हाथों से हमने काम को छिनते देखा
अमीरों की ऐशगाह, गरीबों की कब्र  
इस देश को बनते देखा

और बहुत कुछ लुटते और लूटते देखा
लोकतंत्र के सारे तंत्रों को अपंग होते देखा
वोट को बिकते, सच को सिसकते देखा
हमने लोकतंत्र को घुटनों बल मुर्दा देखा


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