बुधवार, 27 नवंबर 2013

गरीबों के नाम पर इज्जत, पैसा, शांति...

बड़े लोगों का जत्था फिर निकला फरेब करने
नवाबों का, अफसरशाहों का, जमींदारों का, मालिकों का
चोरों का, मक्कारों का, चापलूसों का, गद्दारों का, बेईमानों का
देखो, ये फिर लामबंद हुए काली कमाई से शान्ति कमाने को

फिर इन्हे आवाज आई मर चुके दिल के कोनों से
ये फिर ठण्ड में अपना नाम करने चले
ये फिर लोगों में कम्बल बांटने चले
ये फिर दिखावे और ढोंग की चाल चलने चले

ये बड़ी आसानी से भुला देते हैं कि, ये हैं
तभी तो कम्बल चाहते लोगों पर छत नहीं
ये वो बहरूपिये होते हैं जो चंद टुकड़े फ़ेंक
उससे भी खूब कमाना जानते हैं इज्जत, पैसा, शांति

सुना है सीएसआर की नयी दूकान इन लोगों ने बनायी है
जो पहले खूब लूटती है, फिर कुछ रेवड़ियां बाँट देती है
लूट के माल को हजम कर, गरीबों के हकों को मारकर
मन कि शान्ति कमाना आसान तो नहीं...

और है हिम्मत और ईमानदारी तो ये पूंछे खुदसे
कहाँ से आता है वो पैसा, जो इनको इजाज़त देता है
कम्बल बांटने की, सीएसआर कि दूकान चलाने की
इज्जत, पैसा, शांति गरीबों के नाम पर कमाने की...



1 टिप्पणी:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आप को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-तुमसे कोई गिला नहीं है

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